वो लड़की फिर नहीं मिली। कभी नहीं। आज कई महीनों, वर्षों के बाद सोचता हूं कि वो क्यों नहीं मिली तो तस्वीर कुछ साफ होती सी लगती है।
मैं आज भी सोच में पड़ जाता हूं कि ऐसा कैसे हो सकता है..कि वो मुझसे मिलना ही ना चाहे। ऐसा नहीं होना चाहिए था। जो लड़की मुझसे एक दिन भी बात नहीं करने पर तड़प उठती थी और जिसका फोन मैंने अगर एक बार भी नहीं उठाया तो एक हजार शिकायतें दर्ज हो जाती थीं वो भला मुझे कैसे छोड़ कर जा सकती है।
ऐसा कोई दिन नहीं गया जब सबसे पहले उसका फोन ना आया हो, ऐसी कोई घटना नहीं घटी जिसकी सबसे पहले उसको जानकारी ना मिली हो। और रही बात उसके बारे में जानने की..तो वो सचमुच खुली किताब थी..एक ऐसी किताब जिसमें ज्यादा अध्याय नहीं थे। बस स्कूल, कालेज जाना और उसी दौरान किसी के प्रेम में पड़ना..और फिर उससे अलग हो जाना। इतनी ही कहानी थी उसकी।
वो कितनी लंबी थी या कितनी छोटी, चलते हुए उसके चप्पलों से खट-खट की आवाज आती थी या नहीं, उसके बाल भूरे थे या काले, आंखें नीली थीं या नहीं..मेरे लिए इसके कोई मायने नहीं थे। तब मेरे लिए सिर्फ उसके होने के मायने थे और आज सिर्फ उसके नहीं होने के मायने हैं। लेकिन वो चली गई। यूं ही, और ऐसे ही जैसे कभी मेरी जिंदगी में आई थी।
थोड़े दंभ, थोड़ी बेफिक्री में ये सोच कर मैं चुप रहा कि वो जाएगी कहां? उसे तो आना ही होगा। वो मेरे बिना रह ही कहां सकती है? और इसी में महीने साल में बदलते गए..वो नहीं आई। कुछ दिनों तक मेरी बेफिक्री ने तो मुझसे यही कहा कि चली गई तो चली गई। मेरे पास किस चीज की कमी है, और यही सोचता-सोचता मैं और दूर होता गया। अपने व्यस्त जीवन में और व्यस्त हो गया। लेकिन कहीं न कहीं दिल में ये ख्याल आता रहा कि कल सुबह उसका फोन आएगा और फिर वो मेरे साथ होगी।
आखिर कहां चूक हो गई?
आज सोचने बैठा हूं तो कई सवाल दिल में शूल बन कर चुभ रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जिसके सबसे करीब होते हैं उसी को ठीक से समझ नहीं पाते। जाने-अनजाने उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। कई बार उससे इतनी उम्मीद कर बैठते हैं, जितनी खुद से नहीं कर सकते।
छोटा था तो मेरे शहर की दीवारों पर किसी धार्मिक संस्था के कुछ संदेश लिखे होते थे- मुझे आज भी याद है एक संदेश-"दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार मत करो, जो तुम्हें खुद के लिए पसंद नहीं है।" हजारों बार पढ़े इस संदेश को शायद मैं अमल में नहीं ला पाया। और आज जब वो लड़की नहीं है तो रिश्तों की नई भाषा समझ आ रही है। हम सोचते हैं कि रिश्ते कभी छूटते नहीं। लेकिन ये गलत है। रिश्ता कोई भी हो, छूट सकता है, अगर हम उसे निभा नहीं सकते तो। उसे निभाने के लिए ईमानदारी पहली शर्त हो सकती है, लेकिन सबसे बड़ी नहीं।
सबसे बड़ी शर्त होती है रिश्तों को समझने की।
Monday, 9 April 2007
Saturday, 31 March 2007
वो 27 साल
ब्लाग के तमाम मित्रों ने जो जवाब मुझे भेजे उसके बाद मैं बाध्य हो गया कुछ और कहने के लिए। मैं सभी को अलग से जवाब नहीं दे पा रहा हूं, लेकिन जिन लोगों ने मेंरे ब्लाग को पढ़ा और अपनी प्रतिक्रिया दी है उनके लिए मैं दिल से आभारी हूं। कई लोगों ने इतना भावुक हो कर लिखा है कि मेरे पास कहने को कुछ रह ही नही गया। ब्लाग के कुछ मित्रों के नाम मैं जरुर लेना चाहूंगा जिन्होंने मेरी उन यादों को ताजा कर दिया है जिन्हें भूलने के लिए मैं पिछले 27 साल से लगातार कोशिश कर रहा हूं।
आशीष और सागर चंद नाहर ने तो दिल को छू लिया है। संयुक्त अरब अमीरात से बेजी ने एक सुंदर कविता के माध्यम से मुझे जिंदगी को थाम लेने का संदेश दिया है। पियूष ने लिखा है कि आपका मकसद खुशियों की सौगात देना है..
मुझे नहीं पता कि मेरा मकसद क्या है। लेकिन आपके पत्र ने मुझे बाध्य किया है 27 साल पीछे जाने के लिए..
मैं छोटा था। बुरा तो लगा,लेकिन दिल ने यही कहा कि उसने जानबूझ कर नहीं किया होगा। आज लगता है कि पिताजी भी तिलमिलाए थे लेकिन उस वक्त उन्होंने टीटीई को कुछ कहा नहीं था। सारी रात हमलोग कुछ खा नहीं पाए थे। मुझे भूख लग रही थी, लेकिन ऐसा लग रहा था मां की तबियत ट्रेन में ही बिगड़ने लगी है और इतनी ज्यादा कि एक बार पिताजी को लगा कि इलाहाबाद में ही उतर जाएं। लेकिन मां ने हिम्मत बंधाई और हम सुबह किसी तरह कानपुर पहुंच गए। उसी दिन कानपुर के हैलट हास्पिटल में मां को ले जाया गया दोपहर तक डाक्टर ने आशंका जता दी कि उन्हें कैंसर है।
कैंसर है ये जानने के बाद पिताजी और मां पर क्या गुजरी होगी मैं आज भी इसका अंदाजा नहीं लगा पा रहा हूं। लेकिन मेरी जितनी उम्र थी उसमें मेरी समझ में इतना आ रहा था कि कुछ गंभीर बीमारी है। मां को लगातार टायलेट जाना पड़ता था और मुझे लग रहा था कि उनका पेट खराब है। मैं एक दिन बाजार गया तो मैंने पिताजी से कहा कि आप पचनोल (पाचक का एक ब्रांड, जो तब बहुत प्रचलित था) खरीद लीजिए। पिताजी ने पूछा कि पचनोल क्यों खाना है। मैंने धीरे से कहा मां के लिए लेना है। मां बहुत बीमार हैं और पचनोल खा कर उनका पेट ठीक हो जाएगा।
पिताजी एकदम चुप हो गए। मेरा हाथ पकड़ कर वे बाजार से मुझे घर ले लाए। घर पर आने के बाद उन्होंने कुर्सी पर बिठाया और बताना शुरु किया कि मां के पेट में कैंसर है। एक ऐसी बीमारी जिसका इलाज ही नहीं। और शायद नम होती आंखों से उन्होंने तब लास्ट स्टेज जैसी कोई बात भी कही थी जो मेरे पल्ले नहीं पड़ने वाली थी। इतना कह कर वे चुप हो गए।
मैं भी चुप रहा। फिर इलाज का लंबा सिलसिला चलता रहा। मां और बीमार होती रही। एक दिन डाक्टर ने अस्पताल से ले जाने को कह दिया। पिताजी मां को घर लेकर आए और उसी शाम फिर ट्रेन से अपने शहर की ओर चल पड़े। इस ट्रेन में रिजर्वेशन था। ट्रेन में चढ़ते ही मुझे वो टीटीई याद आ गया। मुझे लगा कि वो आज फिर मां को कहीं अपने जूते से रगड़ता हुआ ना जाए। एक साथ हमारे तीन बर्थ थे। मैंने पिताजी से धीरे से कहा कि मां को सबसे उपर वाली बर्थ पर लिटा देते हैं। लेकिन पिताजी कहने लगे नहीं नीचे ही उन्हें आराम रहेगा। शायद वे पिछली बार टीटीई वाली बात भूल गए थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उन्हें कैसे बताउं कि टीटीई आए तो मां उपर वाले बर्थ पर अगर रहेगी तो टीटीई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। लेकिन मैं फिर चुप रहा।
मैं कब सोया, और कब जागा मुझे याद नहीं।
अब आज अगर थोड़ा आगे बढ़ कर स्वीकार कर लूं कि अब तक नहीं जागा हूं तो आप मुझे पागल कहेंगे। लेकिन हकीकत यही है।
शहर में फिल्म लगी थी "अंखियों के झरोखों से" मां से मैंने कहा कि मैं भी फिल्म देखना चाहता हूं। मां लेटी-लेटी बोली चले जाओ। मैंने पूरी फिल्म देखी। इस फिल्म को देखने के बाद पहली बार मैं कैंसर नामक बीमारी के सच से रुबरु हुआ। फिल्म देखने के बाद मैं बहुत उदास हुआ। और यही सोचता रहा कि फिल्म की नायिका काश ठीक हो जाती। शाम को मैं जब घर आया तो मां ने मुझे अपने पास बुलाया और पूछा कि फिल्म कैसी लगी। मैंने मां से कहा कि फिल्म बहुत ही अच्छी थी। फिर बात आगे बढ़ाते हुए मां ने मुझसे ये जानना चाहा कि फिल्म की कहानी क्या थी। मुझे फिल्म जितनी समझ में आयी थी मैंने बता दिया। बस आखिर में मैंने ये कहा कि हीरोइन को कैंसर हो गया था लेकिन वो एकदम ठीक हो गई और फिर हीरो से उसकी शादी भी हो गई। ये एकदम अक्समात बोला गया झूठ था और मां ने उस पर यकीन भी कर लिया। उसके बाद मेरी हिम्मत बढ़ने लगी। मैं मां को रोज कहने लगा कि आप एकदम ठीक हो जाएंगी। और ये कहते कहते मुझे यकीन हो चला कि मैंने जो फिल्म देखी थी उसमें वाकई हीरोइन ठीक हो गई थी।
लेकिन मां की तबियत सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी। लगातार उसका वजन कम हो रहा था। मैंने उन्हीं दिनों कहीं कैंसर पर एक विज्ञापन पढ़ लिया कि क्या आपको पता है कि कैंसर के मरीज को कितना दर्द होता है..और इसी में बताया गया था कि आप अपनी उंगलियों को दरवाजों के बीच रख कर दबाइए..और सोचिए कि इसका दस गुना दर्द कैंसर का मरीज हर मिनट सहता है।
इस विज्ञापन के बाद तो मैं सदमें में आ गया। मुझे लगने लगा कि मां जो सारी रात कराहती है वो दर्द की वजह से। और जब भी मैं या पिताजी कमरे में जाते तो वो एक मुस्कुराहट के साथ उस दर्द को दबाने की कोशिश करती है। वो पहला मौका था जब मैंने एक कागज के टुकड़े पर लिखा था कि भगवान मेरी मां को मौत दे दो।
मेरे चाहने से क्या होना था। मां तब भी जिंदा रही। मेरे चाहने के नौ महीने बाद तक। तब तक जब तक कि डाक्टर ने पिताजी कह नहीं दिया कि मार्च नहीं खीच पाएंगी।
उन्तीस मार्च से एक रात पहले यानी 28 मार्च को मुझे मां ने अपने पास बिठाया था और वो सब कहा था जिसे मैंने इसके पहले लिखा है। लेकिन 29 मार्च की सुबह मुझे याद है, मां ने पिताजी को बुलाया और कहा कि थोड़ा पानी पिला दें। पिताजी ग्लास में पानी लेकर खड़े थे। मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा - मेरे मुंह में पानी डालिए। पिताजी ने चम्मच से उनके मुंह में पानी डाला। मां के दोनों जुड़े हुए हाथ मुझे आज भी याद हैं...जिससे उसने पिताजी को प्रणाम किया था....कहा कुछ भी नहीं था। और फिर उसकी आंखें बंद हो गईं।
(मुझसे कई लोगों ने पूछा है कि मैं पत्रकार हूं तो अपने लेखों को छपवाता क्यों नहीं? इस पर मुझे सिर्फ इतना कहना है कि ये लेख नहीं है....ये मेरे दिल की टीस है।)
आशीष और सागर चंद नाहर ने तो दिल को छू लिया है। संयुक्त अरब अमीरात से बेजी ने एक सुंदर कविता के माध्यम से मुझे जिंदगी को थाम लेने का संदेश दिया है। पियूष ने लिखा है कि आपका मकसद खुशियों की सौगात देना है..
मुझे नहीं पता कि मेरा मकसद क्या है। लेकिन आपके पत्र ने मुझे बाध्य किया है 27 साल पीछे जाने के लिए..
***
ट्रेन धड़धड़ाती हुई चली जा रही थी। मेरी मां बहुत बीमार थी हमारे उस छोटे से शहर के डॉक्टर ने कहा था कि किसी बड़े अस्पताल में फौरन दिखाइए। उस छोटे से शहर में कोई बड़ा अस्पातल था ही नहीं, लिहाजा पिताजी ने तुरंत तय किया कि हम कानपुर चलेंगे, वहां हमारे रिश्तेदार भी हैं और बड़ा अस्पताल भी। पिताजी, मां और मैं, तीनों लोग ट्रेन से चल पड़े कानपुर की ओर। पिताजी ने सेकेंड क्लास का टिकट तो ले लिया था लेकिन रिजर्वेशन नहीं मिला था। रिजर्वेशन नहीं था इसलिए बर्थ भी नहीं मिली। हमलोग टायलेट के पास किसी तरह बैठ गए थे। मां लोहे के बक्से पर बैठी थी। उसके पेट में कोई तकलीफ थी ऐसे में टायलेट के पास बैठना उसके लिए सुखद ही था। वो तकरीबन हर दस मिनट पर टायलेट जा रही थी। करीब दो घंटे के बाद काले कोट में टीटीई वहां आया। उसने पिताजी से टिकट के बारे में पूछा, पिताजी ने टिकट दिखाया। टीटीई ने पूछा कि रिजर्वेशन नहीं है? पिताजी ने कहा जल्दी में जाना है रिजर्वेशन ले नहीं पाया। आप चाहें तो दे दें। टीटीई ने पिताजी के कहा बर्थ तो मिल जाएगी लेकिन आपको तीस रुपए उपर से देने होंगे। पिताजी को ये बात नागवार गुजरी। उन्होंने उससे कहा कि बर्थ के लिए उपर से पैसे देना जायज नहीं होगा। टीटीई एकदम उबल पड़ा। मुझे अच्छी तरह याद है कि उसने ये कहा था कि पैसे नहीं दोगे तो मरो यहीं पर, और चलते हुए मां को जानबूझ कर जूते से रगड़ता हुआ गया था।मैं छोटा था। बुरा तो लगा,लेकिन दिल ने यही कहा कि उसने जानबूझ कर नहीं किया होगा। आज लगता है कि पिताजी भी तिलमिलाए थे लेकिन उस वक्त उन्होंने टीटीई को कुछ कहा नहीं था। सारी रात हमलोग कुछ खा नहीं पाए थे। मुझे भूख लग रही थी, लेकिन ऐसा लग रहा था मां की तबियत ट्रेन में ही बिगड़ने लगी है और इतनी ज्यादा कि एक बार पिताजी को लगा कि इलाहाबाद में ही उतर जाएं। लेकिन मां ने हिम्मत बंधाई और हम सुबह किसी तरह कानपुर पहुंच गए। उसी दिन कानपुर के हैलट हास्पिटल में मां को ले जाया गया दोपहर तक डाक्टर ने आशंका जता दी कि उन्हें कैंसर है।
कैंसर है ये जानने के बाद पिताजी और मां पर क्या गुजरी होगी मैं आज भी इसका अंदाजा नहीं लगा पा रहा हूं। लेकिन मेरी जितनी उम्र थी उसमें मेरी समझ में इतना आ रहा था कि कुछ गंभीर बीमारी है। मां को लगातार टायलेट जाना पड़ता था और मुझे लग रहा था कि उनका पेट खराब है। मैं एक दिन बाजार गया तो मैंने पिताजी से कहा कि आप पचनोल (पाचक का एक ब्रांड, जो तब बहुत प्रचलित था) खरीद लीजिए। पिताजी ने पूछा कि पचनोल क्यों खाना है। मैंने धीरे से कहा मां के लिए लेना है। मां बहुत बीमार हैं और पचनोल खा कर उनका पेट ठीक हो जाएगा।
पिताजी एकदम चुप हो गए। मेरा हाथ पकड़ कर वे बाजार से मुझे घर ले लाए। घर पर आने के बाद उन्होंने कुर्सी पर बिठाया और बताना शुरु किया कि मां के पेट में कैंसर है। एक ऐसी बीमारी जिसका इलाज ही नहीं। और शायद नम होती आंखों से उन्होंने तब लास्ट स्टेज जैसी कोई बात भी कही थी जो मेरे पल्ले नहीं पड़ने वाली थी। इतना कह कर वे चुप हो गए।
मैं भी चुप रहा। फिर इलाज का लंबा सिलसिला चलता रहा। मां और बीमार होती रही। एक दिन डाक्टर ने अस्पताल से ले जाने को कह दिया। पिताजी मां को घर लेकर आए और उसी शाम फिर ट्रेन से अपने शहर की ओर चल पड़े। इस ट्रेन में रिजर्वेशन था। ट्रेन में चढ़ते ही मुझे वो टीटीई याद आ गया। मुझे लगा कि वो आज फिर मां को कहीं अपने जूते से रगड़ता हुआ ना जाए। एक साथ हमारे तीन बर्थ थे। मैंने पिताजी से धीरे से कहा कि मां को सबसे उपर वाली बर्थ पर लिटा देते हैं। लेकिन पिताजी कहने लगे नहीं नीचे ही उन्हें आराम रहेगा। शायद वे पिछली बार टीटीई वाली बात भूल गए थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उन्हें कैसे बताउं कि टीटीई आए तो मां उपर वाले बर्थ पर अगर रहेगी तो टीटीई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। लेकिन मैं फिर चुप रहा।
मैं कब सोया, और कब जागा मुझे याद नहीं।
अब आज अगर थोड़ा आगे बढ़ कर स्वीकार कर लूं कि अब तक नहीं जागा हूं तो आप मुझे पागल कहेंगे। लेकिन हकीकत यही है।
शहर में फिल्म लगी थी "अंखियों के झरोखों से" मां से मैंने कहा कि मैं भी फिल्म देखना चाहता हूं। मां लेटी-लेटी बोली चले जाओ। मैंने पूरी फिल्म देखी। इस फिल्म को देखने के बाद पहली बार मैं कैंसर नामक बीमारी के सच से रुबरु हुआ। फिल्म देखने के बाद मैं बहुत उदास हुआ। और यही सोचता रहा कि फिल्म की नायिका काश ठीक हो जाती। शाम को मैं जब घर आया तो मां ने मुझे अपने पास बुलाया और पूछा कि फिल्म कैसी लगी। मैंने मां से कहा कि फिल्म बहुत ही अच्छी थी। फिर बात आगे बढ़ाते हुए मां ने मुझसे ये जानना चाहा कि फिल्म की कहानी क्या थी। मुझे फिल्म जितनी समझ में आयी थी मैंने बता दिया। बस आखिर में मैंने ये कहा कि हीरोइन को कैंसर हो गया था लेकिन वो एकदम ठीक हो गई और फिर हीरो से उसकी शादी भी हो गई। ये एकदम अक्समात बोला गया झूठ था और मां ने उस पर यकीन भी कर लिया। उसके बाद मेरी हिम्मत बढ़ने लगी। मैं मां को रोज कहने लगा कि आप एकदम ठीक हो जाएंगी। और ये कहते कहते मुझे यकीन हो चला कि मैंने जो फिल्म देखी थी उसमें वाकई हीरोइन ठीक हो गई थी।
लेकिन मां की तबियत सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी। लगातार उसका वजन कम हो रहा था। मैंने उन्हीं दिनों कहीं कैंसर पर एक विज्ञापन पढ़ लिया कि क्या आपको पता है कि कैंसर के मरीज को कितना दर्द होता है..और इसी में बताया गया था कि आप अपनी उंगलियों को दरवाजों के बीच रख कर दबाइए..और सोचिए कि इसका दस गुना दर्द कैंसर का मरीज हर मिनट सहता है।
इस विज्ञापन के बाद तो मैं सदमें में आ गया। मुझे लगने लगा कि मां जो सारी रात कराहती है वो दर्द की वजह से। और जब भी मैं या पिताजी कमरे में जाते तो वो एक मुस्कुराहट के साथ उस दर्द को दबाने की कोशिश करती है। वो पहला मौका था जब मैंने एक कागज के टुकड़े पर लिखा था कि भगवान मेरी मां को मौत दे दो।
मेरे चाहने से क्या होना था। मां तब भी जिंदा रही। मेरे चाहने के नौ महीने बाद तक। तब तक जब तक कि डाक्टर ने पिताजी कह नहीं दिया कि मार्च नहीं खीच पाएंगी।
उन्तीस मार्च से एक रात पहले यानी 28 मार्च को मुझे मां ने अपने पास बिठाया था और वो सब कहा था जिसे मैंने इसके पहले लिखा है। लेकिन 29 मार्च की सुबह मुझे याद है, मां ने पिताजी को बुलाया और कहा कि थोड़ा पानी पिला दें। पिताजी ग्लास में पानी लेकर खड़े थे। मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा - मेरे मुंह में पानी डालिए। पिताजी ने चम्मच से उनके मुंह में पानी डाला। मां के दोनों जुड़े हुए हाथ मुझे आज भी याद हैं...जिससे उसने पिताजी को प्रणाम किया था....कहा कुछ भी नहीं था। और फिर उसकी आंखें बंद हो गईं।
(मुझसे कई लोगों ने पूछा है कि मैं पत्रकार हूं तो अपने लेखों को छपवाता क्यों नहीं? इस पर मुझे सिर्फ इतना कहना है कि ये लेख नहीं है....ये मेरे दिल की टीस है।)
Wednesday, 28 March 2007
फिर कुछ कहना है
आज फिर कहने को कुछ है, इसलिए लंबे समय के बाद कुछ लिखने बैठा हूं। पिछले दिनों कई लोगों से मुलाकात हुई, कई लोगों से बात हुई। हर आदमी अपने आप में असंतुष्ट दिखा और थोड़ा दुखी भी। आखिर क्यों? कई दिनों तक चुपचाप सोचता रहा। आखिर आदमी खुश क्यों नहीं है। जिसे जो चाहिए था उसे पा कर भी वो खुश नहीं है। जिसे चाहिए था उसे नहीं मिला जाहिर है, वो भी दुखी है। दिल ने खुद से बहुत सवाल किए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम खुश होना ही नहीं चाहते, या फिर हम दुखी रहने के अभ्यस्त हो चले हैं। मैं कई जगहों पर गया। देश में भी और विदेश में भी। इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक और दिल्ली से लेकर मुंबई तक। दुख ने किसी का पीछा नहीं छोड़ा है। मैं बहुत बार सोचता हूं कि ऐसा क्यों है?
मेरी मां 1980 में कैंसर नामक बीमारी से मरी थी। मेरे पिताजी की जितनी हैसियत थी, उनका भरपूर इलाज कराते रहे और डाक्टर के ये बताने के बाद भी कि वो नहीं बच सकतीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और सबकुछ वैसे ही करते रहे जैसे उन्हें करना चाहिए था। मां को नहीं बचना था, और वो बची भी नहीं। लेकिन अपनी बीमारी के कुल एक साल की अवधि में वो जिस तरह रही वो एक शान की जिंदगी थी। आखिर जिस दिन उसकी मौत हुई उसके पहले वाली रात वो मुझे बैठा कर बहुत दुलार करती रही और उसने मुझसे कहा कि अब मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पाउंगी। मैं एक छोटा बच्चा था। इतना छोटा कि ठीक से उनके नहीं होने का मतलब नहीं समझ पा रहा था और ना ही ये समझ पा रहा था कि आखिर वो मेरा साथ क्यों नहीं दे पाएगी, या उसने मेरा साथ कैसे दिया है। मैं बस इतना जानता था कि वो बहुत बीमार है, इतनी बीमार कि उसका वजन 60 किलो से कुल 15 किलो रह गया था और वो मुझे हमेशा कपड़े में लिपटी हुई हड्डियों का ढांचा भर नजर आती थी। फिर भी मां कह रही थी और मैं सुन रहा था। लेकिन मां ने दो बातें ऐसी कही थीं, जो आज मुझे बहुत प्रासंगिक लगती हैं। एक-मां ने कहा था कि जिस चीज को दिल में नहीं रख सकते उसे मुट्ठी में पकड़ने से कोई फायदा नहीं, और दूसरे हमेशा खुश रहना।
मां ने ये क्यों कहा था तब ये मेरी समझ में नहीं आया था। लेकिन आज जब इतने दिनों बाद आप तक लौट कर आया हूं तो उस सवाल को कुरेदता हुआ ही आया हूं।
मैं पिछले महीने वाशिंगटन डीसी से न्यूयार्क ट्रेन से गया। ट्रेन में मुझे एक गुजराती सज्जन मिले। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे योगी हैं। और इसी ट्रेन से कैनेडा जा रहे हैं। रास्ते में ही उन्होंने मुझे ये भी बताया कि उनके भीतर आध्यात्मिक शक्ति है और वे कैनेडा में इसी विद्या से लोगों का इलाज करते हैं। मैंने पूछा कि आपने भारत क्यों छोड़ दिया तो उन्होंने सीधे और साफ शब्दों में कहा कि भारत में उनकी विद्या का कोई कद्रदान ही नहीं था। मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है। खैर मैं उन्हें कुरेदता रहा और वो बताते रहे। साढ़े तीन घंटे के सफर में उन्होंने बहुत कुछ बताया लेकिन आखिर में उन्होंने मुझसे कहा कि कैनेडा में वे रह जरुर रहे हैं, लेकिन उनका मकसद अमेरिका में बसना है और यहां बसने के लिए वे कई चक्कर लगा चुके हैं। उन्हें ग्रीन कार्ड की तलाश थी जो उन्हें नहीं मिल पा रहा था और कैनेडा का उनका वीजा बस खत्म ही होने वाला था। वे दुखी थे। उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी और एक बिंदु पर तो उन्होंने अपनी बेबसी को इस हद तक उजागर कर दिया कि इस दुनिया में अच्छे आदमी को लोग समझ ही नहीं पाते, ना ही उनकी कोई कद्र होती है।
एक योगी जो मेरी समझ में सुख-दुख के मायने मुझसे कहीं बेहतर जानता और समझता होगा वो दुखी दिखा तो मुझे अफसोस हुआ।
प्रसंगवश दूसरी एक और घटना की चर्चा करना चाहूंगा- मेरे एक मित्र को भारत में कोई नौकरी नहीं मिली तो वो अमेरिका के ही न्यूजर्सी शहर में किसी तरह बस गया। कैसे बसा ये कभी विस्तार से बताउंगा। लेकिन अभी अपनी इस बार की यात्रा में मैं उससे मिला। मेरा मित्र मुझे कुछ आहत और दुखी दिखा। मैंने उससे पूछा-तुम खुश तो हो न! इसके बाद उसकी आंखें छलछला आईं, उसने यही कहा कि खुशी किसे कहते हैं नहीं पता। धन है....बस धन है। भारत जाता हूं तो लोगों के लिए गिफ्ट ले जाता हूं। लोग मुझे हाथो हाथ लेते हैं। सभी मुझे घर पर बुलाते हैं। मैं लोगों के लिए सफलता की मिसाल हूं। लोगों के सामने खुश हूं। लेकिन आज तुमने ऐसा सवाल पूछ दिया है कि क्या मैं खुश हूं?
फिर उसने बताया कि वो बस पैसा कमाने की मशीन भर बन गया है। उसे हाई ब्लडप्रेशर और शुगर की बीमारी हो गई है और वो कभी अपनी जिंदगी जी ही नहीं पाया। खुशी की तलाश में वो बस भटक रहा है। कौन सी खुशी ये उसे भी नहीं पता।
मां ने कहा था जिस चीज को दिल में नहीं रख सकते उसे मुट्ठी में पकड़ने का कोई फायदा नहीं, और हमेशा खुश रहना।
मेरा दोस्त और मुझे जो योगी मिला था दोनों दिल से खुशी को नहीं पकड़ पाए थे। दोनों खुशी को मुट्ठी में पकड़े घूम रहे हैं और दोनों ही खुश नहीं हैं। इतने दिनों बाद समझ में आया कि मरती हुई मां ने दो वाक्यों को एक साथ क्यों कहा था। मैंने उदाहरण में दो घटनाएं आपको सुनाई, लेकिन हकीकत में जितने लोगों से मिला सभी दुखी दिखे..और वजह यही कि हम खुशी को दिल में नहीं रखते जाहिर है कि उसे मुट्ठी में रखने की कोशिश करते हैं और तलाश भी वहीं से करते हैं। जिस दिन दिल में रखने लगेंगे..और दिल में तलाशने लगेंगे हमारी जिंदगी के मायने बदल जाएंगे। ठीक वैसे ही जैसे मेरी मरती हुई मां मरने के एक दिन पहले भी जिंदगी से पूरी संतुष्ट और पूरी खुश दिख रही थी। ठीक वैसे ही जैसे मेरे पिताजी अपनी पत्नी के इलाज में अपनी जिंदगी भर की कमाई को खर्च करके बाकी के जीवन खुश रहे।
चालीस साल की उम्र में अपने जीवन साथी को गंवा देने वाले पिताजी बाकी की जिंदगी उनकी उन्हीं यादों के सहारे काटते चले गए, लेकिन वे जब तक रहे , खुश रहे। दिल की खुशियों को उन्होंने मुट्ठी मे भर-भर कर लुटाया। कई सालों बाद मैंने उनसे एक दिन पूछा था कि आपको क्या कभी कोई दुख नहीं होता..तो वे हिंदी फिल्म का एक गाना गुनगुनाने लगे "मुझे गम भी उनका अज़ीज है कि ये उन्हीं की दी हुई चीज है।"
(मां की मौत 29 मार्च की सुबह हुई थी और 27 साल पहले आज की रात ही वो रात थी जब मां ने मुझसे ये बात कही थी)
मेरी मां 1980 में कैंसर नामक बीमारी से मरी थी। मेरे पिताजी की जितनी हैसियत थी, उनका भरपूर इलाज कराते रहे और डाक्टर के ये बताने के बाद भी कि वो नहीं बच सकतीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और सबकुछ वैसे ही करते रहे जैसे उन्हें करना चाहिए था। मां को नहीं बचना था, और वो बची भी नहीं। लेकिन अपनी बीमारी के कुल एक साल की अवधि में वो जिस तरह रही वो एक शान की जिंदगी थी। आखिर जिस दिन उसकी मौत हुई उसके पहले वाली रात वो मुझे बैठा कर बहुत दुलार करती रही और उसने मुझसे कहा कि अब मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पाउंगी। मैं एक छोटा बच्चा था। इतना छोटा कि ठीक से उनके नहीं होने का मतलब नहीं समझ पा रहा था और ना ही ये समझ पा रहा था कि आखिर वो मेरा साथ क्यों नहीं दे पाएगी, या उसने मेरा साथ कैसे दिया है। मैं बस इतना जानता था कि वो बहुत बीमार है, इतनी बीमार कि उसका वजन 60 किलो से कुल 15 किलो रह गया था और वो मुझे हमेशा कपड़े में लिपटी हुई हड्डियों का ढांचा भर नजर आती थी। फिर भी मां कह रही थी और मैं सुन रहा था। लेकिन मां ने दो बातें ऐसी कही थीं, जो आज मुझे बहुत प्रासंगिक लगती हैं। एक-मां ने कहा था कि जिस चीज को दिल में नहीं रख सकते उसे मुट्ठी में पकड़ने से कोई फायदा नहीं, और दूसरे हमेशा खुश रहना।
मां ने ये क्यों कहा था तब ये मेरी समझ में नहीं आया था। लेकिन आज जब इतने दिनों बाद आप तक लौट कर आया हूं तो उस सवाल को कुरेदता हुआ ही आया हूं।
मैं पिछले महीने वाशिंगटन डीसी से न्यूयार्क ट्रेन से गया। ट्रेन में मुझे एक गुजराती सज्जन मिले। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे योगी हैं। और इसी ट्रेन से कैनेडा जा रहे हैं। रास्ते में ही उन्होंने मुझे ये भी बताया कि उनके भीतर आध्यात्मिक शक्ति है और वे कैनेडा में इसी विद्या से लोगों का इलाज करते हैं। मैंने पूछा कि आपने भारत क्यों छोड़ दिया तो उन्होंने सीधे और साफ शब्दों में कहा कि भारत में उनकी विद्या का कोई कद्रदान ही नहीं था। मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है। खैर मैं उन्हें कुरेदता रहा और वो बताते रहे। साढ़े तीन घंटे के सफर में उन्होंने बहुत कुछ बताया लेकिन आखिर में उन्होंने मुझसे कहा कि कैनेडा में वे रह जरुर रहे हैं, लेकिन उनका मकसद अमेरिका में बसना है और यहां बसने के लिए वे कई चक्कर लगा चुके हैं। उन्हें ग्रीन कार्ड की तलाश थी जो उन्हें नहीं मिल पा रहा था और कैनेडा का उनका वीजा बस खत्म ही होने वाला था। वे दुखी थे। उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी और एक बिंदु पर तो उन्होंने अपनी बेबसी को इस हद तक उजागर कर दिया कि इस दुनिया में अच्छे आदमी को लोग समझ ही नहीं पाते, ना ही उनकी कोई कद्र होती है।
एक योगी जो मेरी समझ में सुख-दुख के मायने मुझसे कहीं बेहतर जानता और समझता होगा वो दुखी दिखा तो मुझे अफसोस हुआ।
प्रसंगवश दूसरी एक और घटना की चर्चा करना चाहूंगा- मेरे एक मित्र को भारत में कोई नौकरी नहीं मिली तो वो अमेरिका के ही न्यूजर्सी शहर में किसी तरह बस गया। कैसे बसा ये कभी विस्तार से बताउंगा। लेकिन अभी अपनी इस बार की यात्रा में मैं उससे मिला। मेरा मित्र मुझे कुछ आहत और दुखी दिखा। मैंने उससे पूछा-तुम खुश तो हो न! इसके बाद उसकी आंखें छलछला आईं, उसने यही कहा कि खुशी किसे कहते हैं नहीं पता। धन है....बस धन है। भारत जाता हूं तो लोगों के लिए गिफ्ट ले जाता हूं। लोग मुझे हाथो हाथ लेते हैं। सभी मुझे घर पर बुलाते हैं। मैं लोगों के लिए सफलता की मिसाल हूं। लोगों के सामने खुश हूं। लेकिन आज तुमने ऐसा सवाल पूछ दिया है कि क्या मैं खुश हूं?
फिर उसने बताया कि वो बस पैसा कमाने की मशीन भर बन गया है। उसे हाई ब्लडप्रेशर और शुगर की बीमारी हो गई है और वो कभी अपनी जिंदगी जी ही नहीं पाया। खुशी की तलाश में वो बस भटक रहा है। कौन सी खुशी ये उसे भी नहीं पता।
मां ने कहा था जिस चीज को दिल में नहीं रख सकते उसे मुट्ठी में पकड़ने का कोई फायदा नहीं, और हमेशा खुश रहना।
मेरा दोस्त और मुझे जो योगी मिला था दोनों दिल से खुशी को नहीं पकड़ पाए थे। दोनों खुशी को मुट्ठी में पकड़े घूम रहे हैं और दोनों ही खुश नहीं हैं। इतने दिनों बाद समझ में आया कि मरती हुई मां ने दो वाक्यों को एक साथ क्यों कहा था। मैंने उदाहरण में दो घटनाएं आपको सुनाई, लेकिन हकीकत में जितने लोगों से मिला सभी दुखी दिखे..और वजह यही कि हम खुशी को दिल में नहीं रखते जाहिर है कि उसे मुट्ठी में रखने की कोशिश करते हैं और तलाश भी वहीं से करते हैं। जिस दिन दिल में रखने लगेंगे..और दिल में तलाशने लगेंगे हमारी जिंदगी के मायने बदल जाएंगे। ठीक वैसे ही जैसे मेरी मरती हुई मां मरने के एक दिन पहले भी जिंदगी से पूरी संतुष्ट और पूरी खुश दिख रही थी। ठीक वैसे ही जैसे मेरे पिताजी अपनी पत्नी के इलाज में अपनी जिंदगी भर की कमाई को खर्च करके बाकी के जीवन खुश रहे।
चालीस साल की उम्र में अपने जीवन साथी को गंवा देने वाले पिताजी बाकी की जिंदगी उनकी उन्हीं यादों के सहारे काटते चले गए, लेकिन वे जब तक रहे , खुश रहे। दिल की खुशियों को उन्होंने मुट्ठी मे भर-भर कर लुटाया। कई सालों बाद मैंने उनसे एक दिन पूछा था कि आपको क्या कभी कोई दुख नहीं होता..तो वे हिंदी फिल्म का एक गाना गुनगुनाने लगे "मुझे गम भी उनका अज़ीज है कि ये उन्हीं की दी हुई चीज है।"
(मां की मौत 29 मार्च की सुबह हुई थी और 27 साल पहले आज की रात ही वो रात थी जब मां ने मुझसे ये बात कही थी)
Friday, 15 December 2006
पत्नी और बेटा
अब जो आपको अपनी आपबीती सुनाने जा रहा हूं वो भी किसी के साथ हो सकता है, क्या पता हुआ भी हो। लेकिन मुझे बहुत हैरानी है कि भारत में ये सब क्यों और कैसे होता है और बर्दाश्त करना हमारी मजबूरी बन जाती है। दो साल पहले मैं अमेरिका में था। मेरी पत्नी और मेरे बेटे का कहना था कि यहीं बस जाना चाहिए। लेकिन तीन साल वहां रहने के बाद मुझे लगने लगा था कि भारत में रहना इतना बुरा नहीं है जितना हम सोचते हैं। शायद है भी नहीं। इसलिए मैंने पत्नी और बेटे को समझाया और मनाया कि अपने वतन वापस चलते हैं, और उन्हें मना कर दो साल पहले हमलोग लौट आए।
आपको पिछले दिनों इसी ब्लाग में मैंने अपनी कार दुर्घटना की कहानी सुनाई थी। सारा कुछ करने के बाद भी मैं कुछ नहीं कर पाया और एक पुलिस वाला अपनी मनमानी कर गया।
लेकिन अब जो हुआ है वो दुखद तो है ही, हास्यास्पद भी है।
पिछले दिनों मेरे पास बिजली विभाग की तरफ से पत्र आया कि मुझ पर करीब 34000 रुपए का बकाया है और मैंने अगर फौरन भुगतान नहीं किया तो बिजली काट दी जाएगी। मैं बहुत परेशान हुआ कि हमेशा नियमित बिल का भुगतान करता हूं तो ये बकाया कैसे आया। मैंने दिल्ली में यमुना पावर के दफ्तर में फोन किया तो मुझे बताया गया कि मैं दफ्तर जा कर उनसे संपर्क करूं। बहुत मुश्किल से दफ्तर से छुट्टी लेकर मैं उनके दफ्तर गया और लंबी लाइन से निकलने के बाद मेरी मुलाकात एक अफसर से हुई। अफसर ने कंप्यूटर में कुछ देखा और प्रिंट निकाल कर मेरे सामने रख दिया। उन्होंने बताया कि नया इलेक्ट्रानिक मीटर लगने से पहले का मीटर काम नहीं कर रहा था क्योंकि तीन साल तक मेरा बिल न्यूनतम आया है। तब ये सरकारी महकमा यानी दिल्ली बिजली बोर्ड था और उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। अब ये प्राइवेट कंपनी है और इस कंपनी ने ये पाया कि मेरा न्यूनतम बिल जो आ रहा था वो मीटर की खराबी के कारण था। उन्होंने साल भर पहले नया मीटर लगाया है और अब आज की बिजली खपत को आधार बना कर पिछले एक साल का बिल मुझ तक भेजा गया है, उन्होंने ये भी कहा कि मीटर तो तीन साल नहीं चला पर दो साल का मामला उन्होंने रफा दफा कर दिया है।
मैं इन तीन सालों में भारत में नहीं था। मेरे घर पर ताला बंद था और मैंने इसकी सूचना बिजली विभाग को दे भी दी थी कि घर में ताला बंद रहेगा। जाहिर है जब घर में कोई नहीं था तो बिजली की खपत भी नहीं होनी थी। ऐसे में जो न्यूनतम बिल था वही आएगा...और उसका भी लगातार भुगतान होता रहा। मैने उस अधिकारी को बताया कि घर बंद था इसलिए न्यूनतम बिल आया। ऐसे में आप आज कैसे पुराने आधार पर बिल भेज सकते हैं। अफसर इस बात पर थोड़ा चौंका। उसने पूछा कि क्या प्रमाण है कि मैं तब यहां नहीं था। मैने उसे बिजली विभाग को लिखी चिट्ठी की कापी दिखाई। थोड़ी देर बाद उसने कहा कि आप कल आईएगा। मैं बहुत परेशान हुआ कि कल फिर छुट्टी लेनी होगी। खैर अगले दिन मैं फिर गया। वो अफसर उस दिन छुट्टी पर था। मैंने किसी और अफसर से बात की तो फिर से वही कहानी दुहराई गई। मुझे दुबारा सारा कुछ विस्तार से बताना पड़ा। उसने सारी बात सुन कर कहा कि आपकी समस्या का समाधान यही है कि आप कल जिस अफसर से मिले थे उन्हीं से दुबारा मिलें। दिल्ली की सर्दी में माथे से पसीना पोछता हुआ मैं वापस आया। अब मैं कल फिर बिजली विभाग के दफ्तर में गया। वो अफसर वहां मिल गया। उसने मुझसे कहा कि पूरा मामला कलेक्शन एजंसी के पास है। लिहाजा मुझे भुगतान कर देना चाहिए ताकि बिजली ना कटे।
मन मसोस कर मैं बिजली विभाग के दफ्तर की सीढ़ियों से नीचे उतरा। कार में बैठा और सोचने लगा कि क्या मेरी पत्नी और बेटा सही कह रहे थे?
आपको पिछले दिनों इसी ब्लाग में मैंने अपनी कार दुर्घटना की कहानी सुनाई थी। सारा कुछ करने के बाद भी मैं कुछ नहीं कर पाया और एक पुलिस वाला अपनी मनमानी कर गया।
लेकिन अब जो हुआ है वो दुखद तो है ही, हास्यास्पद भी है।
पिछले दिनों मेरे पास बिजली विभाग की तरफ से पत्र आया कि मुझ पर करीब 34000 रुपए का बकाया है और मैंने अगर फौरन भुगतान नहीं किया तो बिजली काट दी जाएगी। मैं बहुत परेशान हुआ कि हमेशा नियमित बिल का भुगतान करता हूं तो ये बकाया कैसे आया। मैंने दिल्ली में यमुना पावर के दफ्तर में फोन किया तो मुझे बताया गया कि मैं दफ्तर जा कर उनसे संपर्क करूं। बहुत मुश्किल से दफ्तर से छुट्टी लेकर मैं उनके दफ्तर गया और लंबी लाइन से निकलने के बाद मेरी मुलाकात एक अफसर से हुई। अफसर ने कंप्यूटर में कुछ देखा और प्रिंट निकाल कर मेरे सामने रख दिया। उन्होंने बताया कि नया इलेक्ट्रानिक मीटर लगने से पहले का मीटर काम नहीं कर रहा था क्योंकि तीन साल तक मेरा बिल न्यूनतम आया है। तब ये सरकारी महकमा यानी दिल्ली बिजली बोर्ड था और उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। अब ये प्राइवेट कंपनी है और इस कंपनी ने ये पाया कि मेरा न्यूनतम बिल जो आ रहा था वो मीटर की खराबी के कारण था। उन्होंने साल भर पहले नया मीटर लगाया है और अब आज की बिजली खपत को आधार बना कर पिछले एक साल का बिल मुझ तक भेजा गया है, उन्होंने ये भी कहा कि मीटर तो तीन साल नहीं चला पर दो साल का मामला उन्होंने रफा दफा कर दिया है।
मैं इन तीन सालों में भारत में नहीं था। मेरे घर पर ताला बंद था और मैंने इसकी सूचना बिजली विभाग को दे भी दी थी कि घर में ताला बंद रहेगा। जाहिर है जब घर में कोई नहीं था तो बिजली की खपत भी नहीं होनी थी। ऐसे में जो न्यूनतम बिल था वही आएगा...और उसका भी लगातार भुगतान होता रहा। मैने उस अधिकारी को बताया कि घर बंद था इसलिए न्यूनतम बिल आया। ऐसे में आप आज कैसे पुराने आधार पर बिल भेज सकते हैं। अफसर इस बात पर थोड़ा चौंका। उसने पूछा कि क्या प्रमाण है कि मैं तब यहां नहीं था। मैने उसे बिजली विभाग को लिखी चिट्ठी की कापी दिखाई। थोड़ी देर बाद उसने कहा कि आप कल आईएगा। मैं बहुत परेशान हुआ कि कल फिर छुट्टी लेनी होगी। खैर अगले दिन मैं फिर गया। वो अफसर उस दिन छुट्टी पर था। मैंने किसी और अफसर से बात की तो फिर से वही कहानी दुहराई गई। मुझे दुबारा सारा कुछ विस्तार से बताना पड़ा। उसने सारी बात सुन कर कहा कि आपकी समस्या का समाधान यही है कि आप कल जिस अफसर से मिले थे उन्हीं से दुबारा मिलें। दिल्ली की सर्दी में माथे से पसीना पोछता हुआ मैं वापस आया। अब मैं कल फिर बिजली विभाग के दफ्तर में गया। वो अफसर वहां मिल गया। उसने मुझसे कहा कि पूरा मामला कलेक्शन एजंसी के पास है। लिहाजा मुझे भुगतान कर देना चाहिए ताकि बिजली ना कटे।
मन मसोस कर मैं बिजली विभाग के दफ्तर की सीढ़ियों से नीचे उतरा। कार में बैठा और सोचने लगा कि क्या मेरी पत्नी और बेटा सही कह रहे थे?
Wednesday, 6 December 2006
दो महिलाएं
पिछले दिनों दो महिलाओं से अलग-अलग तारीख में मिलना पड़ा। एक महिला मेरे दफ्तर के स्टूडियो में इंटरव्यू के सिलसिले में आई थी तो दूसरी का इंटरव्यू करने मुझे दिल्ली के ताज महल (मानसिंह रोड) होटल में जाना पड़ा। पहली महिला के इंटरव्यू का जो तय समय था वो उसी समय पर हमारे दफ्तर पहुंच गई तो दूसरी का इंटरव्यू करने मैं समय पर पहुंच गया। दोनों महिलाएं जानी मानी हस्ती हैं। दोनों की अपनी खूबियां हैं और दोनों ही बेहद खूबसूरत भी। एक की लंबाई दूसरे के मुकाबले कम थी तो रंग दूसरे से साफ था। दोनों की आंखों में चमक थी। दोनों के चेहरे पर आत्मविश्वास पूरा था। दोनों ही महिलाओं की मैंने कई फिल्में देख रखी थीं इसलिए दोनों से मुलाकात
और बात में ज्यादा औपचारिकता नहीं रही। इनमें से पहली महिला का नाम उर्मिला मातोंडकर है जिसकी पहली फिल्म मैने देखी थी-मासूम। तब वो एक छोटी सी और प्यारी सी बच्ची थी। लेकिन मेरी मुलाकात उससे तब हुई जब वो भूत फिल्म में काम कर चुकी थी और इसके बाद भी कुछ फिल्में आ चुकी थीं। दूसरी महिला का नाम है मल्लिका शेरावत। मल्लिका की फिल्म मर्डर मैने कुछ साल पहले देखी थी, शायद अपने अमेरिका प्रवास में। तब अमेरिका में मेरा पूरा परिवार हिंदी की हर फिल्म वीडियो पर देखता था और इंडियन स्टोर में आसानी से पाइरेटेड वीडियो की कापी मिल जाती थी। उर्मिला की फिल्म भूत कहानी के हिसाब से चाहे जितनी लचर रही हो उनकी एक्टिंग लाजवाब थी। कहने की जरुरत नहीं कि इसके पहले प्यार तूने क्या किया में भी उर्मिला ने शानदार एक्टिंग की थी। उसी उर्मिला को सामने देख कर मुझे बहुत खुशी हुई। दूसरी तरफ पिछले हफ्ते जब मल्लिका से मिला तो कुछ ऐसा लगा कि 'गर्ल नेक्स्ट डोर' से मेरी मुलाकात हो रही है। उर्मिला से मुलाकात में लगा कि वो अब मासूम की ना तो बच्ची है और ना ही भूत से डरने वाली एक महिला। उर्मिला काफी संभली सी लगी और बातचीत में पूरी गंभीर बनी रही। इंटरव्यू के दौरान थोड़ी हंसी जरुर दिखी लेकिन चमकती आंखों में कुछ खामोशी सी भी दिखी। क्यों? मैं सोचता रहा। मल्लिका कुछ देर से इंटरव्यू के लिए आई थी। आने के बाद लगा कि थोड़ी गंभीरता उसने ओढ़ रखी है, लेकिन पांच मिनट के बाद ही मल्लिका पूरी तरह मल्लिका दिखने लगी। थोड़ी शोख, थोड़ी स्टाइलिश और अपने चेहरे और ड्रेस को लेकर पूरी तरह चौकस। उर्मिला का इंटरव्यू जब हो रहा था तब एक बार भी उन्होंने अपने मेकअप मैन को बीच में आने की अनुमति नहीं दी। लेकिन मल्लिका ने आधे घंटे के इंटरव्यू में हर चौथे मिनट मेकअप मैन को याद किया, आईना में चेहरा देखा। उर्मिला के चेहरे पर कहीं अकेलेपन की टीस थी (कह नहीं सकता कि ये मेरे देखने का नजरिया था या सच्चाई) तो मल्लिका के चेहरे पर सबके साथ होने की
दमक। मैंने अपने मोबाइल फोन से दोनों की तस्वीर उनसे पूछ कर उतारी। बाद में तस्वीर भी मैंने कई बार देखी और सोचता रहा कि क्यों मल्लिका ऐसी लग रही थी कि वो बालीवुड के साथ कदम ताल कर रही है और उर्मिला एकदम अकेली है, इसका जवाब मुझे नहीं मिला। उर्मिला पहले से फिल्मों में हैं और उसे उन तमाम लोगों का साथ मिला है जो उसे बालीवुड में किसी मुकाम पर पहुंचा सकते थे। मल्लिका के साथ ऐसा नहीं रहा। मल्लिका ने खुद ही इंटरव्यू में माना कि ना तो उनके नाम के साथ मशहूर सरनेम जुड़ा था और ना ही फिल्मों में कोई उसका आका रहा। और तो और उसे अपना फिल्मी सफर शुरु करने से पहले नाम तक बदलना पड़ा। कोई बहुत ज्यादा फिल्में भी उसके खाते में नहीं दिखीं। मर्डर के अलावा जिस फिल्म की थोड़ी चर्चा की जा सकती है वो है प्यार के साइड इफेक्ट्स। फिर भी मल्लिका चंचल और खुशमिजाज दिखी और उर्मिला उदास। उर्मिला की उदासी मुझे इसलिए ज्यादा खली क्योंकि वो रंगीला की एक ऐसी लड़की थी जिसके अपने सपने थे और उन सपनों को साकार करने के लिए उसने एक ऐसा रास्ता चुना जिस पर चल कर वहां तक पहुंचना इतना आसान हकीकत में नहीं होता जितना फिल्म में था। तो क्या हकीकत में उर्मिला के साथ ऐसा ही हुआ? मर्डर से फिल्मों में छा जाने वाली मल्लिका का जीवन कैसा है नहीं पता, लेकिन जितना जाना उसके मुताबिक उसके मम्मी-पापा उसके फिल्मी करियर से खुश नहीं थे। फिर भी मल्लिका खुश दिखी। लगा जिंदगी में कई रंग हैं। दोनों लड़कियों से मिलने के बाद कई सवाल दिल में रह गए। दोनों आज के दौर की महिलाएं हैं। दोनों सफल हैं। दोनों एक ही विधा में हैं। फिर ये फर्क क्यों? दोनों ने मेरे दिल को छुआ। दोनों की अपने आप में अलग-अलग कहानी हैं। तो क्या दूसरों की कहानी को अभिनय में ढालने वाली इन महिलाओं की अपनी कहानी अनकही और अनसुनी है? क्या दोनों की कामयाबी के राह अलग-अलग हैं? ये सवाल दिल में लेकर मैं नींद से कई बार उठा हूं और सोचता हूं कि ये सफलता का दंश है या फिर दंभ। एक के चेहरे पर मुझे दंश और दूसरे के चेहरे पर दंभ क्यों दिखा?
और बात में ज्यादा औपचारिकता नहीं रही। इनमें से पहली महिला का नाम उर्मिला मातोंडकर है जिसकी पहली फिल्म मैने देखी थी-मासूम। तब वो एक छोटी सी और प्यारी सी बच्ची थी। लेकिन मेरी मुलाकात उससे तब हुई जब वो भूत फिल्म में काम कर चुकी थी और इसके बाद भी कुछ फिल्में आ चुकी थीं। दूसरी महिला का नाम है मल्लिका शेरावत। मल्लिका की फिल्म मर्डर मैने कुछ साल पहले देखी थी, शायद अपने अमेरिका प्रवास में। तब अमेरिका में मेरा पूरा परिवार हिंदी की हर फिल्म वीडियो पर देखता था और इंडियन स्टोर में आसानी से पाइरेटेड वीडियो की कापी मिल जाती थी। उर्मिला की फिल्म भूत कहानी के हिसाब से चाहे जितनी लचर रही हो उनकी एक्टिंग लाजवाब थी। कहने की जरुरत नहीं कि इसके पहले प्यार तूने क्या किया में भी उर्मिला ने शानदार एक्टिंग की थी। उसी उर्मिला को सामने देख कर मुझे बहुत खुशी हुई। दूसरी तरफ पिछले हफ्ते जब मल्लिका से मिला तो कुछ ऐसा लगा कि 'गर्ल नेक्स्ट डोर' से मेरी मुलाकात हो रही है। उर्मिला से मुलाकात में लगा कि वो अब मासूम की ना तो बच्ची है और ना ही भूत से डरने वाली एक महिला। उर्मिला काफी संभली सी लगी और बातचीत में पूरी गंभीर बनी रही। इंटरव्यू के दौरान थोड़ी हंसी जरुर दिखी लेकिन चमकती आंखों में कुछ खामोशी सी भी दिखी। क्यों? मैं सोचता रहा। मल्लिका कुछ देर से इंटरव्यू के लिए आई थी। आने के बाद लगा कि थोड़ी गंभीरता उसने ओढ़ रखी है, लेकिन पांच मिनट के बाद ही मल्लिका पूरी तरह मल्लिका दिखने लगी। थोड़ी शोख, थोड़ी स्टाइलिश और अपने चेहरे और ड्रेस को लेकर पूरी तरह चौकस। उर्मिला का इंटरव्यू जब हो रहा था तब एक बार भी उन्होंने अपने मेकअप मैन को बीच में आने की अनुमति नहीं दी। लेकिन मल्लिका ने आधे घंटे के इंटरव्यू में हर चौथे मिनट मेकअप मैन को याद किया, आईना में चेहरा देखा। उर्मिला के चेहरे पर कहीं अकेलेपन की टीस थी (कह नहीं सकता कि ये मेरे देखने का नजरिया था या सच्चाई) तो मल्लिका के चेहरे पर सबके साथ होने की
दमक। मैंने अपने मोबाइल फोन से दोनों की तस्वीर उनसे पूछ कर उतारी। बाद में तस्वीर भी मैंने कई बार देखी और सोचता रहा कि क्यों मल्लिका ऐसी लग रही थी कि वो बालीवुड के साथ कदम ताल कर रही है और उर्मिला एकदम अकेली है, इसका जवाब मुझे नहीं मिला। उर्मिला पहले से फिल्मों में हैं और उसे उन तमाम लोगों का साथ मिला है जो उसे बालीवुड में किसी मुकाम पर पहुंचा सकते थे। मल्लिका के साथ ऐसा नहीं रहा। मल्लिका ने खुद ही इंटरव्यू में माना कि ना तो उनके नाम के साथ मशहूर सरनेम जुड़ा था और ना ही फिल्मों में कोई उसका आका रहा। और तो और उसे अपना फिल्मी सफर शुरु करने से पहले नाम तक बदलना पड़ा। कोई बहुत ज्यादा फिल्में भी उसके खाते में नहीं दिखीं। मर्डर के अलावा जिस फिल्म की थोड़ी चर्चा की जा सकती है वो है प्यार के साइड इफेक्ट्स। फिर भी मल्लिका चंचल और खुशमिजाज दिखी और उर्मिला उदास। उर्मिला की उदासी मुझे इसलिए ज्यादा खली क्योंकि वो रंगीला की एक ऐसी लड़की थी जिसके अपने सपने थे और उन सपनों को साकार करने के लिए उसने एक ऐसा रास्ता चुना जिस पर चल कर वहां तक पहुंचना इतना आसान हकीकत में नहीं होता जितना फिल्म में था। तो क्या हकीकत में उर्मिला के साथ ऐसा ही हुआ? मर्डर से फिल्मों में छा जाने वाली मल्लिका का जीवन कैसा है नहीं पता, लेकिन जितना जाना उसके मुताबिक उसके मम्मी-पापा उसके फिल्मी करियर से खुश नहीं थे। फिर भी मल्लिका खुश दिखी। लगा जिंदगी में कई रंग हैं। दोनों लड़कियों से मिलने के बाद कई सवाल दिल में रह गए। दोनों आज के दौर की महिलाएं हैं। दोनों सफल हैं। दोनों एक ही विधा में हैं। फिर ये फर्क क्यों? दोनों ने मेरे दिल को छुआ। दोनों की अपने आप में अलग-अलग कहानी हैं। तो क्या दूसरों की कहानी को अभिनय में ढालने वाली इन महिलाओं की अपनी कहानी अनकही और अनसुनी है? क्या दोनों की कामयाबी के राह अलग-अलग हैं? ये सवाल दिल में लेकर मैं नींद से कई बार उठा हूं और सोचता हूं कि ये सफलता का दंश है या फिर दंभ। एक के चेहरे पर मुझे दंश और दूसरे के चेहरे पर दंभ क्यों दिखा?
प्रसंगवश
मेरी एक दोस्त ने एक शापिंग मॉल के बाहर अपनी कार पार्क की। कार पार्क करते ही पार्किंग वाला वहां आया। उसने पैसे मांगे तो मेरी दोस्त ने कहा कि वापसी पर पैसे दूंगी। पार्किंग वाले ने कहा कि नहीं अभी पैसे देने होंगे। इसपर मेरी दोस्त ने कहा कि पैसे ले कर आपलोग यहां से खिसक जाते हैं, और वापसी पर कोई कार की रखवाली करता नहीं मिलता। लेकिन पार्किंग वाला नहीं माना। मेरी दोस्त ने जिद में आकर कहा कि कार तो यहीं रहेगी जो चाहे कर लो। ये कह कर वो चली गई। करीब घंटे भर बाद जब वो वहां आई तो उसने देखा कि चारों पहियों की हवा निकली हुई है और दरवाजे के लॉक टूटे हुए हैं। उसने घबरा कर अपने पति को फोन किया। पति एक बड़े टीवी पत्रकार हैं और उन्होंने अपने संपर्क का इस्तेमाल करते हुए क्राइम रिपोर्टर से वहां के थानेदार को फोन करवा दिया। थानेदार आया और उसने शिकायत लिखी। शिकायत पर अमल करते हुए थानेदार ने पार्किंग ठेकेदार को थाने में बुलाया। ठेकेदार थाने में आते ही मेरी दोस्त के पैरों पर गिर पड़ा। उसने माफी मांगी और कहा कि वो उसकी बहन की तरह है, कृपया शिकायत वापस ले ले। इस पर मेरी दोस्त पिघल गई और थानेदार से उसने शिकायत वापस ले ली। बात खत्म हो गई। पार्किंग ठेकेदार आराम से चला गया। उसने मेरी दोस्त की कार का लॉक ठीक करवा दिया। चारों पहिए में हवा भरवा दी।
हमने थानेदार की तारीफ की, कि उसने अपना काम दुरुस्त किया। पार्किंग ठेकेदार के होश ठिकाने लगा दिए। मेरी दोस्त ने कहा कि ज्यादा कार्रवाई की जरुरत नहीं थी। जितना हुआ ठीक रहा। ऐसा होने से पार्किंग वाले ठीक रहेंगे। उनकी मनमानी और दादागीरी नहीं चलेगी।
पिछले हफ्ते गाजियाबाद के उस थानेदार का फोन मेरी दोस्त के पास आया। उसने कहा कि आपकी तो बड़ी सिफारिश है। मुझे बचा लीजिए। मेरी दोस्त ने पूछा कि ऐसा क्या हुआ। उसने बताया कि पार्किंग ठेकेदार उस दिन तो चला गया, लेकिन उसने मेरठ में डीआईजी से मेरी शिकायत की। कहा कि एक महिला के कहने पर थानेदार ने उसे थाने में बुलवाया और पांव पर गिरवाया। डीआईजी साहब बहुत नाराज हुए। उन्होंने थानेदार का ट्रांसफर मेरठ करवा दिया।
कहने की जरुरत नहीं कि जिस पार्किंग ठेकेदार को हम मामूली आदमी मान रहे थे, वो थानेदार पर भी कैसे भारी था। कितना पैसा पार्किंग के ठेके में लगा है और कितनी धांधली चल रही है ये भी बताने की जरुरत है क्या?
हमने थानेदार की तारीफ की, कि उसने अपना काम दुरुस्त किया। पार्किंग ठेकेदार के होश ठिकाने लगा दिए। मेरी दोस्त ने कहा कि ज्यादा कार्रवाई की जरुरत नहीं थी। जितना हुआ ठीक रहा। ऐसा होने से पार्किंग वाले ठीक रहेंगे। उनकी मनमानी और दादागीरी नहीं चलेगी।
पिछले हफ्ते गाजियाबाद के उस थानेदार का फोन मेरी दोस्त के पास आया। उसने कहा कि आपकी तो बड़ी सिफारिश है। मुझे बचा लीजिए। मेरी दोस्त ने पूछा कि ऐसा क्या हुआ। उसने बताया कि पार्किंग ठेकेदार उस दिन तो चला गया, लेकिन उसने मेरठ में डीआईजी से मेरी शिकायत की। कहा कि एक महिला के कहने पर थानेदार ने उसे थाने में बुलवाया और पांव पर गिरवाया। डीआईजी साहब बहुत नाराज हुए। उन्होंने थानेदार का ट्रांसफर मेरठ करवा दिया।
कहने की जरुरत नहीं कि जिस पार्किंग ठेकेदार को हम मामूली आदमी मान रहे थे, वो थानेदार पर भी कैसे भारी था। कितना पैसा पार्किंग के ठेके में लगा है और कितनी धांधली चल रही है ये भी बताने की जरुरत है क्या?
Tuesday, 5 December 2006
आप सभी की प्रतिक्रियाएं
आप लोगों की प्रतिक्रियाएं मिलीं। कई लोगों ने मुझे सलाह दी है कि मैं किसी क्राइम रिपोर्टर से संपर्क करूं। सवाल ये है कि क्या बिना सिफारिश के कोई काम नहीं हो सकता है? वैसे आप लोगों को बता दूं कि मैंने अपने कई रिपोर्टरों के अलावा दूसरे चैनल के साथी रिपोर्टरों से भी मदद मांगी। सवाल मेरे पैसे के नुकसान का तो था ही, मैं चाहता था कि एक टैक्सी चलाने वाले को सबक भी मिले ताकि इस देश में कुछ भी चलेगा की सोच ज्यादा न फले फूले। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। मेरे सभी रिपोर्टर मुझसे ये कहते हुए गए कि वो एसएचओ को सबक सिखा देंगे। और अंत में सभी यही कहते नजर आए कि वो कुछ नहीं कर पा रहे हैं। एक रिपोर्टर से तो एसएचओ(इंसपेक्टर) ने ये तक कहा कि वो टैक्सी वाला उसके काफी काम आता है और वो पूरी तरह उससे उपकृत हैं। ऐसे में वो कुछ नहीं कर सकते। हो सकता है कि एक एसएचओ एक टैक्सी वाले से इतना उपकृत हो कि वो उसके खिलाफ कार्रवाई ना कर पाए। मुझे ये भी अच्छा लगा कि वो किसी रिश्ते (टैक्सी वाला) के प्रति तो ईमानदार हैं लेकिन ये ईमानदारी उसके अपने काम के लिए भी होनी चाहिए थी। ऐसा ना होने पर उस पुलिस वाले को ये नहीं भूलना चाहिए था कि टैक्सी वाले ने हादसे के बाद जब मुझसे ये कहा था कि मैं चाहूं तो पुलिस बुला लूं- ये कहते हुए उसकी आंखों में दंभ और पुलिस वालों के उसके जेब में होने का गुरुर भी मैने देखा था। हो सकता है आपको ये लगे कि मैं एक छोटी सी शिकायत को इतना तूल क्यों दे रहा हूं। लेकिन मैं मानता हूं कि ये छोटी सी बात सभी को कहीं न कहीं आहत करती होगी। हर आदमी को ये बात तकलीफ देनी ही चाहिए कि कहीं कोई हमारी आपकी जिंदगी से यूं ही सुकुन ना चुरा ले जाए।
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