Saturday 24 October 2009

वो गर्म हथेलियां...


परसों अमिताभ बच्चन से मुलाकात हुई। इससे पहले कई बार मिल चुका हूं। बहुत सी मुलाकातें याद नहीं हैं, लेकिन पहली मुलाकात याद है। 1980 में मां की मृत्यु के बाद लग रहा था कि जिंदगी बेमानी है, पढ़ाई-लिखाई का कोई मतलब नहीं, मौत ही जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य है। और अपने इसी श्मशान वैराग्य भाव से मैंने बहुत से दिन यूं ही भ्रमण करते हुए गुजार दिए, और इसी सिलसिले में मेरा तब कश्मीर जाना हुआ।
एक दोपहर पहलगाम के पास कहीं लगी भीड़ को चीरता हुआ मैं भी तमाशा देखने पहुंच गया था, और तब मुझे पता चला कि वहां अमिताभ बच्चन की किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है। मैं भीड़ में सबसे आगे खड़ा था, और वहां अमिताभ बच्चन परवीन बॉबी के साथ एक ही लाइन पर बार बार थिरक रहे थे। तब मुझे फिल्म का नाम पता नहीं था, लेकिन गाने के बोल थे...इसको क्या कहते हैं....एल--वी-ई।
जैसे ही फिल्म की शूटिंग रुकी बहुत से लोग अमिताभ अमिताभ चिल्लाते हुए आगे बढ़े। मैं भी भाग कर अमिताभ बच्चन के पास पहुंच गया। चारों ओर पुलिस का घेरा था लेकिन मेरे दिल पर पुलिस का कोई खौफ नहीं था। जब तक कोई रोकता, टोकता मैं अमिताभ के सामने था, और अपने फूलते दम के बीच मैंने अमिताभ की ओर अपनी नन्हीं हथेली बढ़ा दी। अमिताभ मेरी ओर देख कर मुस्कुराए और उन्होंने पूछा - पढ़ते हो? मैंने हां में सिर हिलाया और अमिताभ ने मेरी हथेली की ओर हाथ कर दिया। उनकी बहुत चौड़ी हथेली के बीच मेरी एकदम छोटी सी हथेली ऐसे समा गई थी, जैसे कभी मैं मां के सीने में समा जाया करता था। कुछ सेकेंड की ये मुलाकात वहीं खत्म हो गई।
मैं वापस घर चला आया था, और पढ़ाई में जुट गया था। रात में सोते हुए कानों में अमिताभ की आवाज़ गूंजा करती थी - पढ़ते हो?
तब हमारे शहर में बहुत से सिनेमा हॉल नहीं थे, और जो थे उसमें सारी फिल्में रिलीज होने के कई महीनों बाद लगती थीं। स्कूल की किताबों के बीच मेरी आंखें तलाशा करती थीं, अमिताभ बच्चन की फिल्में। मुझे लगता था कि अमिताभ बच्चन की जितनी फिल्में लगेंगी मैं देखूंगा। मेरे बाल मन में ये था कि शायद शूटिंग के वक्त अमिताभ बच्चन से हाथ मिलाने का वो सीन भी उसमें आ गया हो।
और ऐसे ही मैं अमिताभ बच्चन की त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर और बहुत सी फिल्में देख गया। बिन मां का मैं, पिता संत- ऐसे में मुझे ना तो कोई रोकने वाला था और ना टोकने वाला। स्कूल और सिनेमा हॉल दोनों मेरी जिंदगी के सबसे अहम हिस्सा बन गए थे। सिनेमा हॉल के बाहर मेरी मां के सीने जितनी विशाल अमिताभ की हथेली मुझे पुकारती रहती थीं और यही वजह थी कि अमिताभ बच्चन के हाथों की वो गर्मी मैं कभी भूल ही नहीं पाया जिसे मैने पहलगाम की सर्द हवाओं के बीच महसूस किया था।
अपने उम्र के जिस पड़ाव पर मैं त्रिशूल देख रहा था उस पड़ाव पर मुझे फिल्मों की कहानी कुछ-कुछ सच लगा करती थी। अमिताभ बच्चन की मां फिल्म में मर रही थी, और मरते हुए उसे उसका सच बता रही थी कि तुम्हारा बाप आर के गुप्ता है.....और तभी हॉल में एक तल्ख सी आवाज़ गूंजी मिस्टर आर के गुप्ता मैं रहा हूं।
मरती हुई मां के हाथों को अपने हाथों में थामे..एकदम लाचार और बेबस अमिताभ को देख कर मुझे लगने लगा कि अमिताभ बच्चन की मां सचमुच मर गई हैं। मैं आ रहा हूं...ये चार शब्द मेरे कानों में जीने की चाहत की तरह गूंज रहे थे, और आर के गुप्ता को मिटा देने की तमन्ना मुझमें नई उर्जा भर रही थी – मेरी जेब में पांच फूटी कौड़ियां नहीं है, और मैं पांच लाख का सौदा करने आया हूं – ये वाक्य मुझे आगे बढ़ने को उकसा रहे थे।

जिंदगी भर सरकारी नौकरी में रहे मेरे पिता जो मां की मौत के बाद गुमसुम से हो गए थे, वे मेरे लिए देवता समान थे। लेकिन इस देवता समान पिता के बेटे ने अपना सहारा ढूंढ लिया था अमिताभ बच्चन में। उसके दिलो दिमाग में ये बात बैठ गई थी कि बिना पांच फूटी कौड़ियों के भी पांच लाख का सौदा हो सकता है, बस चाहिए वो आत्मविश्वास और वो जिद..जो अमिताभ की आंखों थीं।
और फिर मैंने देखी मुकद्दर का सिकंदर- फिल्म में अमिताभ को खान बाबा बता रहे थे, हंस सिकंदर-हंस...तकदीर तेरे कदमों में होगी..तू मुकद्दर का सिकंदर होगा...और इसी फिल्म में अमिताभ एक दिन अपनी बहन से कह रहे थे - मकान उंचा होने से इंसान उंचा नहीं हो जाता... ये सब सारी बातें किसी के लिए तालियों की गड़गड़ाहट के लिए लिखी गई होंगी लेकिन मेरे लिए अमिताभ के मुंह से निकली सारी बातें एक एक कर गुरुमंत्र बनती चली गईं।
फिर मैंने अमिताभ की एक-एक कर सारी फिल्में देखीं, और उसी में देखी कालिया, जिसकी शूटिंग मैने पहलगाम में देखी थी। लेकिन तब तक मैं फिल्मों और शूटिंग का सच समझ चुका था। लेकिन जो नहीं समझना चाहता था, वो ये कि अमिताभ मेरे लिए फिल्मी हीरो भर नहीं रह गए थे ..वो मेरे लिए कुछ ऐसे बन गए थे...जिनकी हथेलियों के बीच मेरी मां का सारा प्यार सिमटा हुआ था।
कहीं से पंद्रह रुपए में मैं अमिताभ बच्चन का एक पोस्टर खरीद लाया था, उसे फ्रेम करा कर मैने अपने घर के छोटे से ड्राइंग रूम में टांग दिया था। घर पर आने वाले पिताजी से पूछा करते थे कि आपने अमिताभ बच्चन की तस्वीर क्यों टांग रखी है, तो पिताजी मुस्कुरा कर कहते..बेटे की चाहत है।
वो तस्वीर मेरे घर पर टंगी रही जब तक मैं ग्रेजुएशन कर रहा था। ग्रेजुएशन के बाद मैं दूसरे शहर गया आगे पढ़ने। और वो तस्वीर वहीं छूट गई। लेकिन मन में अमिताभ की तस्वीर टंगी रही, जस की तस।
फिर मैं जनसत्ता में नौकरी करने आ गया। और यहीं एक दोपहर मेरी मुलाकात अमिताभ बच्चन से एक समारोह में हो गई। तब तक अमिताभ बच्चन की फिल्में पिटने लगी थीं। जादूगर अजूबे जैसी फिल्में एक-एक टिकट को तरसती नजर आने लगी थीं। मैं अमिताभ से मिला। फिर मैने सहज भाव से उनकी हथेलियों के आगे अपनी हथेलियों को आगे कर दिया था...फिर उनकी चौड़ी हथेलियों के आगे मेरी नन्हीं हथेलियां थीं। और एक बार फिर कई साल पहले मर चुकी मेरी मां के सीने में मैं खुद को समाता हुआ महसूस कर रहा था।
फिर कई बार कई समारोहों में मेरी मुलाकात अमिताभ बच्चन से और हुई...कई बार बातें हुईं और धीरे धीरे अमिताभ मेरे लिए हीरो से बढ़ कर मां में बदलते चले गए।
अब समय आ गया कौन बनेगा करोड़पति का। मेरी पत्नी कौन बनेगा करोड़पति के शुरुआती शो में हिस्सा लेने पहुंच गई थी मुंबई और मैं भी था उसके साथ। अमिताभ बच्चन ने मेरी पत्नी से पूछा आपके साथ कौन आया है, तो मेरी पत्नी ने दर्शकों के बीच बैठे मेरी ओर इशारा किया। अमिताभ मुझे देख कर मुस्कुराए, और शो शुरु हो गया। एक सवाल के जवाब में मेरी पत्नी जब उलझ गई उसे लगा अमिताभ उसे गुमराह कर रहे हैं..लेकिन अमिताभ के चेहरे की मायूसी मुझे बता रही थी कि वो जो इशारा कर रहे हैं, उसे मेरी पत्नी समझे...लेकिन पत्नी नहीं मानी और कुछ रकम लेकर वो शो से बाहर हो गई...जैसे ही शो खत्म हुआ अमिताभ अपनी कुर्सी से उतर कर आए और मेरी पत्नी की ओर देख कर अफसोस जताया, और कहा कि आप और जीत सकती थीं, कम जीत कर जा रही हैं।
जो हुआ सो हुआ। मेरी पत्नी को पैसे का कोई क्रेज नहीं था। वो अमिताभ बच्चन से बात करके, उनसे मिलकर खुश हो रही थी। फिर हमने अमिताभ बच्चन के कुछ लम्हे गुजारे, खाना खाया और मैं उन बड़ी-बड़ी हथेलियों को अपनी नन्हीं सी हथेलियों में समेट कर वापस आ गया।
अमिताभ बच्चन से फिर मुलाकातें हुईं। लेकिन परसो जो मुलाकात हुई तो मुझे उनके साथ पहलगाम में हुई वो मुलाकात ज्यादा याद आई। मैं गुड़गांव के लीला होटल में अमिताभ बच्चन से मिलने गया था। मेरे मन में इच्छा थी कि इस मुलाकात में मैं उनके पांव छू लूंगा, और पक्के तौर पर यही सोच कर गया था। लेकिन वहां पहुंचते ही मेरी हथेलियां मचल उठीं, मां के सीने से लगने को। मैंने कोई कोशिश नहीं की और मेरी हथेलियां उनकी हथेलियों में समा गईं। तब मेरे पास न तो कहने को कुछ था और न सुनने को।
अमिताभ बच्चन मेरी ओर देख कर मुस्कुरा रहे थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि प्रोफेशनल हैसियत से मैं उन्हें मिस्टर बच्चन कहूं या अपने ड्राइंग रूम में टंगी तस्वीर को याद करके अमिताभ बच्चन पुकारूं या फिर गर्म गर्म हथेलियों के बीच सिमटी अपनी हथेलियों को यूं ही उनमें समेटे हुआ मां कह कर उसी में समा जाऊं!
घर आया तो बेटे ने कैमरे में तस्वीरें देखीं। मैंन सुबह ही उसे बताया था कि अमिताभ बचच्न से मिलने जा रहा हूं। उसने पूछा अमिताभ बच्चन से क्या बातें की? मैं चुप रहा। फिर पत्नी ने पूछा अमिताभ बच्चन को तुमने मेरा हैलो कहा या नहीं?
मैं चुप था। मेरी पत्नी और बेटे को लगता रहा कि मैंने अपना समय बर्बाद कर दिया, और अमिताभ से मिल कर भी मैं कोई बात नहीं सका। अब मैं उनसे क्या कहूं? कैसे बताऊं कि अमिताभ बच्चन की हथेलियों में जब मेरे हाथ समा जाते हैं तो मैं कुछ कहने और सुनने की हालत में नहीं होता।
बचपन में अपनी मां को खो देने वाला मैं अगर कभी मां को सामने पा लूंगा तो क्या उससे बातें करुंगा? मैं तो उसके सीने में समा जाऊंगा....

Friday 9 October 2009

मैं क्यों लिखूं?

कल रात अप्पी आई थी। वैसे ही मुस्कुराते हुए, चमकीली आंखों के साथ पांच फीट तीन इंच की अप्पी कह रही थी इतना लिखते हो, मुझ पर कुछ लिखो न!

मेरी नींद खुल गई। काफी देर तक फिर अप्पी मेरे सामने खड़ी रही। बहुत यकीन करने पर ही यकीन हुआ कि वो सचमुच नहीं आई थी, वो सपने में आई थी। लेकिन वो क्यों आई? मैं तो उसे 18 साल से जानता हूं, तब से जब वो तीस साल की थी, और इन 18 सालों में जब वो कभी ऐसै मेरे पास नहीं आई तो आज क्यों आई? वो क्यों चाहती है कि मैं उस पर कुछ लिखूं।

एकदम झक गोरी अप्पी से मेरी मुलाकात कभी होनी ही नहीं थी। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है? ठीक मेरे घर के सामने वाले घर में रह रही अप्पी अपने पति के साथ एकदिन अचानक हमारे घर आ गई। तब मेरे बेटे का दाखिला दिल्ली पब्लिक स्कूल की नर्सरी कक्षा में हुआ था, और उसके बेटे को भी दिल्ली पब्लिक स्कूल की नर्सरी कक्षा में दाखिला चाहिए था। पता नहीं किसने उससे कह दिया कि शायद मेरी जानपहचान है, और मैं उसके बेटे का दाखिला करा सकता हूं। वो अपने पति के साथ बिल्कुल मेरे सामने खड़ी थी, और मुस्कुराती हुई कह रही थी...मुझे तो अपने बेटे को डीपीएस में ही पढ़ाना है, और ये काम आप ही करा सकते हैं।

मैं हतप्रभ था। पहली मुलाकात और इतना हक ! बिना सोचे ही मैंने कह दिया कि कोशिश करूंगा। और फिर एक दिन अप्पी के बेटे को डीपीएस में दाखिला मिल गया। अप्पी फिर मेरे घर आई थी, मिठाई का एक डिब्बा लेकर। साथ में शुक्रिया का एक शब्द होठों में दबाए हुए। और फिर वो तारीख थी और पांच दिन पहले तक की तारीख थी, अप्पी अपने पति के साथ हमारे पूरे परिवार के दिल में समा गई थी। उसका पति मेरा दोस्त था, अप्पी मेरी पत्नी की दोस्त थी और उसका बेटा मेरे बेटे का दोस्त था।

अप्पी इतने सालों में मुझसे वो दो सौ बार मिली होगी, कभी मेरे घर आ कर कभी मेरे उसके घर जाने पर..लेकिन वो बस मुस्कुराती थी और मुस्कुराती थी। जब कभी हम उसके घर लंच या डिनर के लिए गए, अप्पी यूं ही मुस्कुराती हुई मिलती थी, और चाहे मैं चार घंटे बैठा रहूं..बस वो चुपचाप अपने पति और मेरी बातों को मुस्कुराते हुए सुनती थी।

मुझे नहीं पता कि मेरी पत्नी से उसकी क्या बातें होती थीं, ये भी नहीं पता उसके बेटे और मेरे बेटे के बीच क्या बातें होती थीं। करीब आठ साल पहले जब वो हमारे मुहल्ले को छोड़ कर दूसरी जगह चली गई उसके बाद भी हम वैसे ही दोस्त रहे।

आज से ठीक पांच दिन पहले मैं दफ्तर पहुंचा ही था कि मेरी पत्नी का फोन आया। फोन पर थोड़ी झिझकी सी आवाज़ और थोड़ी घबराई आवाज़ में उसने मुझसे पूछा क्या तुम्हें कोई खबर मिली? मैं ने कहा, कैसी खबर? दिन भर खबरों के व्यापार में रहता हूं किस खबर की बात तुम कर रही हो। पत्नी रो नहीं रही थी, पर रुआंसी थी...उससे भी ज्यादा सन्न थी..उसने कहा शायद अप्पी ने आत्म हत्या कर ली है।

इसके बाद न तो मेरे पास कहने को कुछ था न सुनने को।

मैंने गाड़ी वापस मोड़ ली। घर की ओर चल पड़ा। घर पहुंचा तो जो सुना वो सुनाई नहीं पड़ रहा था। मेरी पत्नी कह रही थी, अप्पी ने आत्म हत्या कर ली है। मेरी हिम्मत टूट रही थी। अपने पड़ोसी के साथ कार में बैठ कर बिना कुछ कहे और सुने मैं चल पड़ा था अप्पी के घर।

वहां मुझे सबसे पहले मिला मेरे बेटे का दोस्त..जो अब भी बच्चा ही है। मैंने उससे पूछा क्या हुआ? अप्पी के बेटे ने कहा, “कुछ नहीं पता। बस मम्मी पंखे से लटक गई थी।” उसकी आंखों में आंसू नहीं थे। उन आंखों में आंसू की जगह नहीं बची थी। वो तो शून्य में विलीन हो चुकी आंखें थीं।

भीड़ में कोई फुसफुसा रहा था, पति पत्नी में कल झगड़ा हुआ था और अप्पी ने अपनी जान दे दी।

मैं भीड़ की इस फुसफुसाहट को सुनना नहीं चाह रहा था। आज मुझे अप्पी अच्छी नहीं लग रही थी। मेरे सामने ही वो लेटी हुई थी, सफेद कपड़े में लिपटी हुई। लेकिन मैं नहीं चाह रहा था कि वो मुझे देख कर मुस्कुराए। मैं नहीं चाहता था उससे मिलना।

मैं तो उस अप्पी को चाहता था जो अपने बेटे को स्कूल में दाखिला दिलाने की चाहत लेकर मेरे पास आई थी। मैं उस अप्पी को क्यों चाहूं जो अपने बेटे को यूं ही छोड़ कर भाग गई। जब वो पहली बार मेरे पास आई थी तब उसकी आंखों में बेटे के लिए सपना था। मैं उसके इसी सपने से प्यार करता था। आज वो कैसे अपने ही सपनों से अपनी आंखें मूंद सकती थी? जो अपने बेटे की जिंदगी बनाने के लिए बिना सोचे विचारे एक अनजान आदमी के घर जाकर मनुहार कर सकती थी..वो इतनी स्वार्थी कैसे हो गई?

उसने क्यों नहीं सोचा कि उसके मर जाने का मतलब सिर्फ उसका मर जाना भर नहीं। उसके बाद उसके बेटे उसके पति और उसके उन दोस्तों का क्या होगा..जिनके लिए उसकी मुस्कुराहट संजीवनी से कम नहीं थी।

शायद इसीलिए अप्पी मेरे पास कल रात आई थी। वो अपनी कहानी लिखवाना चाह रही थी..लेकिन क्यों? उसने अपने पति के माथे पर, अपने बेटे की आंखों में और अपने दोस्तों के दिल पर जो कहानी लिख छोड़ी है...क्या उसे ही पन्नों पर उतरवाना चाह रही थी।

नहीं अप्पी, मैं कभी उसे प्यार नहीं कर सकता जिसका अपना स्वार्थ इतना बड़ा हो कि उसे आगे सब कुछ दिखना बंद हो जाए। मैं आज 18 साल की तुम्हारी दोस्ती को अलविदा कहता हूं...और इस दंभ के साथ कहता हूं..कि मैं तुम्हें नापसंद करता हूं। सिर्फ नापसंद। और मैं जिसे नापसंद करता हूं उसकी कहानी क्यों लिखूं?

Friday 13 March 2009

पीली आंखों वाली लड़की

वो लड़की कभी जी ही नहीं पाई। जब उसे पहली बार प्यार हुआ था तब भी नहीं। और अब जब उसके बेटे की शादी हो गई है तब भी नहीं।

जब उसे प्यार हुआ था तब पूरा घर उसका दुश्मन हो गया था। सबने कहा था ये गुनाह है। फिर भी छिप-छिप कर चंद दिनों तक तक वो अपनी चाहत से मिलती रही लेकिन घर वालों ने जल्दी में उसकी शादी कर दी। फिर किसी को पता ही नहीं चला कि कभी उसकी कोई चाहत भी रही थी।

28 साल पहले बीस साल की उम्र में अपने पति के पीछे पीछे वो उस शहर में चली गई थी जहां उसकी चाहत उसका पीछा नहीं कर सकती थी। मैं तब उससे मिला था। मैंने उसकी चमकती आंखों में झांका था। उसकी आंखों का रंग बदल गया था। मैंने देखा था उसकी आंखों का रंग पीला हो गया था।

फिर मैं उससे कई बार मिला। हर बार मैंने देखा उसकी आंखों का पीला रंग गहराता जा रहा था। उसके मुर्झाते लेकिन मुस्कुराते चेहरे को पढ़ने की कई बार मैंने कोशिश की, लेकिन कभी पढ़ नहीं पाया।
फिर मैंने पीली आंखों वाली लड़की के बारे में सोचना छोड़ दिया। मुझे लगता था कि वो अब इन पीली आंखों के साथ जी लेगी। वो एक अमीर पति की पत्नी बन गई थी और चमकती आंखों वाले दो बच्चों की मां बन गई थी।

उसने रात को रात नहीं समझा, दिन को दिन नहीं माना। उसने खुद के लिए कुछ नहीं किया, जो कुछ किया बस अपने पति, दो देवरों, तीन ननदों और दो बेटों के लिए किया। उसने उनमें से किसी आंखों को कभी पीला नहीं पड़ने दिया। इस क्रम में उसके 28 साल निकल गए।

बहुत सालों बाद एक बार फिर मैं उससे मिलने गया था। मैंने इस बार गौर से देखने की कोशिश की, लेकिन मैं चाह कर भी उससे नजरें नहीं मिला सका। मैं मन ही मन सोच रहा था, क्या ये जी रही है?

मेरे पास सिर्फ सवाल थे, जवाब नहीं थे। पीली आंखों वाली लड़की के पास सवाल और जवाब दोनों नहीं। बाकियों के लिए तो ये सवाल ही बेतुका था।

उसकी आंखों का पीलापन बढ़ता गया, और चेहरे की मुर्झाहट भी बढ़ती गई।

एकदिन वो बिस्तर पर गिर गई। तब घर के लोगों को लगा कि कुछ गड़बड़ है। डॉक्टर ने तुरंत उसका इलाज शुरु कर दिया।

कई दिनों से उसकी पीली आंखों का इलाज करने वाले डॉक्टर अब भी उसका इलाज कर रहे हैं। कहते हैं वो बच जाएगी। लेकिन कैसे ? बचने के लिए उसे शरीर का जो अंग चाहिए वो उसे कौन देगा ? वो भी नहीं देंगे जिनकी आंखों को पीला पड़ने से वो बचाती रही है पूरे 28 साल तक।

फिर भी मैं चाहता हूं कि वो थोड़ा और जी ले.. एक बार अपने लिए जी ले..बिना पीली आंखों के जी ले....ये जानते हुए भी कि तो वो कभी जी पाई और आगे जी पाएगी।

मैं ऐसा क्यों चाहता हूं?

...क्योंकि उसने जाने कितनी बार मुझे गले से लगाया है दोस्त बन कर , और सीने से लगाया है मां बन कर।

Thursday 23 October 2008

दो साड़ियां और एक कफन

बैंगलोर से आज फोन आया कि पुतुल की मां अस्पताल में हैं और डॉक्टरों ने उन्हें वेंटिलेटर पर रखा है। अमेरिका के न्यूजर्सी शहर से उनके बेटे के आने का इंतजार हो रहा है और आज शाम उसके आने के बाद वेंटिलेटर हटा दिया जाएगा, फिर वो लोग लाश को पटना ले जाएंगे।

पूरी बात सुनने के बाद मेरे पास कुछ कहने को नहीं बचा था। फोन करने वाले को पता था कि पुतुल की मां की मौत हो चुकी है, लेकिन अमेरिका से उनके बेटे को भारत आने में 18 से 20 घंटे लगेंगे। ऐसे में उन्हें मृत घोषित नहीं किया जा सकता है, और बेटे को मां के अंतिम दर्शन करने की मोहलत भी मिलनी चाहिए।

पुतुल की मां को मैं अपने जन्म के समय से जानता हूं, और आखिरी बार दो महीने पहले मिला था। वो बात-बात पर हंसती थीं और बात-बात पर रोती थीं। दो महीने पहले की मुलाकात में वो 28 साल पहले मर चुकी मेरी मां को याद कर फूट-फूट कर रोने लगी थीं और फिर उन्हें ये समझाना मुश्किल हो गया था कि वो जिस बात पर रो रही हैं वो बहुत पुरानी बात है...लेकिन उनकी याद जा चुकी थी और जो याद बची थी वो बिखरी हुई सी थी।

मेरे पिता और पुतुल के पिता एक ही सरकारी महकमें में काम करते थे और दोनों मेरे और पुतुल के पैदा होने से पहले से एक दूसरे के पड़ोसी थे। मेरी मां पुतुल की मां की दोस्त थीं, और मेरे पिता पुतुल के पिता के दोस्त थे।

सात भाई बहनों वाले उस परिवार में पुतुल मेरी दोस्त थी, शायद पहली दोस्त। वो मुझसे एक साल बड़ी थी लेकिन मैंने अपना पूरा बचपन पुतुल के सहारे ही गुजारा। गुड्डे गुड़ियों की शादी से लेकर कबड्डी खेलने और मारपीट करने तक। बाद में मेरी बहन से पुतुल की दोस्ती हो गई और उसके छोटे भाई से मेरी दोस्ती हो गई।

और तबसे हम लोगों की ये खानदानी दोस्ती चली आ रही है।

आज जब मुझे ये बताया जा चुका है कि पुतुल की मां नहीं रहीं..तो सचमुच मेरे पास कहने को कुछ नहीं सिवाय सोचने के...

मुझे नहीं पता कि पुतुल की मां का नाम क्या था? मैंने और मेरे भाई-बहनों ने हमेशा उन्हें चाची कह कर बुलाया और मां के बराबर माना। सच कहें तो बचपन में हमें ये पता ही नहीं था कि हमलोग पड़ोसी हैं। हमारा वो सरकारी घर एक-दूसरे के घर के बिल्कुल सामने खुलता था और हम यही सोचते थे कि पुतुल के पापा और मेरे पिताजी भाई हैं।
ये रिश्ता चलता रहा और जब मैं पांचवीं या छठी कक्षा में पहुचा तो पता चला कि हमलोग पड़ोस वाले दोस्त थे, क्योंकि इसी साल मेरे पिताजी का ट्रांसफर दूसरे शहर में हुआ था और हम अलग हुए थे। इसके बाद फिर कई मौके आए जब हम दुबारा पड़ोसी बने और हर बार रहे।

पुतुल की मां एक मां थीं। सिर्फ मां। एक ऐसी मां जिसने बच्चों की खुशी और त्याग के हजारों दिन के बीच बस यही चाहा था कि उसके बच्चे पढ़ें। खूब पढ़े। इतना पढ़ें कि घर में सिर्फ खुशियों का राज हो। मैंने उन्हें कभी नई साड़ी खरीदते नहीं देखा, मैंने उन्हें कभी बाहर खाना खाते नहीं देखा, मैंने उन्हें कभी फिल्म देखते नहीं देखा।

मैंने देखा था कि पांच बेटियों और दो बेटों को पढ़ाने के लिए उस छोटे से शहर से कैसे वो पटना चली आई थीं। तब हम पटना में थे और उन्होने दो कमरे का मकान किराए पर हमारे घर के बगल में ही ले लिया था। पुतुल के पापा का ट्रांसफर नहीं हो पाया था और फिर जिंदगी भर नहीं हुआ..लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिए एक मां 40 साल की उम्र में पति से सौ किलोमीटर दूर अलग दूसरे शहर में चली आई थीं।
मेरी मां की मौत 1980 में कैंसर से हुई थी, तब से लेकर कल तक जब कभी मुझे मां के चेहरे की याद आई वो दो आंखें ही याद आईं...जो पुतुल की मां की आंखें थीं।

समय बीतता गया। पुतुल का भाई, जो चौथी कक्षा में मेरा दोस्त बन गया था वो कॉलेज के बाद अमेरिका चला गया, और पिछले 14 सालों से अमेरिका में ही है। बाद में उसका दूसरा छोटा भाई भी अमेरिका चला गया। पुतुल के पापा का दो साल पहले कैंसर से निधन हो चुका था और तब से ये मां अकेली अपनी बेटी के साथ दिन गुजार रही थीं।
मैं दो महीने पहले बैंगलोर गया था। वो एक सूती गाउन में हिलती डुलती हड्डी के रुप में मुझसे मिली थीं। ना वो खा सकती थीं और ना सोच सकती थीं। बस एक शरीर थीं ऐसा शरीर जिसने त्याग के तप से खुद को मिटा दिया और ये त्याग था सात बच्चों की खुशी का।
किराए के मकान में जिंदगी गुजार देने वाली इस मां के बेटों ने मकान खरीदे....गाड़ियां खरीदीं। लेकिन मां उसका सुख भोग पाने के लायक नहीं रह गई थी। दो साड़ियों से ज्यादा की कभी उन्हें जरुरत नहीं रही और आज उसकी भी जरुरत नहीं रही।
आज मैं फिर वही सोच रहा हूं कि हम क्यों भाग रहे हैं? हम कहां भाग रहे हैं? क्या हम भी सिर्फ अपनी जिंदगी से वेंटिलेटर के हटने का इंतजार नहीं कर रहे......हमारी भी मंजिल तो वहीं है न !

Wednesday 21 May 2008

क्योंकि मैं शर्मिंदा हूं- ARUSHI TALWAR MURDERED

मेरी छोटी बहन का फोन आने से पहले मैं सिर्फ विचलित था, लेकिन रात के ११ बजे उससे फोन पर बात करने के बाद से मैं शर्मिंदा हूं। मैं दफ्तर से रोज की तरह घर आ रहा था कि आचानक फोन की घंटी बजी। आम तौर पर गाड़ी चलाते हुए मैं फोन नहीं उठाता, लेकिन रात के समय मेरी बहन ने फोन किया था, जबकि ये समय उसके सो जाने का समय होता है...तो चलती कार में ही मैंने फोन उठा लिया। उसने मुझसे पूछा, "भैया कहां हो?"
मैंने कहा, "बस अभी-अभी दफ्तर से निकला हूं, बताओ क्या हो गया?"
मेरी बहन की कातर आवाज आई, "तुम टीवी पर ये सब क्यों दिखाते हो?"
मैंने पूछा, " क्या हुआ, तुम इस तरह परेशान क्यों हो?"
मेरी बहन ने कहा कि न्यूज चैनल पर लिखा आ रहा है कि बस थोड़ी देर में खुलेगा आरुषि के बेडरूम का राज।
मैंने अपनी बहन को समझाने की कोशिश की कि ये हमारे टीवी चैनल पर नहीं आ रहा, किसी और न्यूज चैनल पर आने वाला होगा। लेकिन उसे ये मैं समझा नहीं सका, क्योंकि उसे लगता है कि देश के सारे टीवी न्यूज चैनल में जो कुछ हो रहा है उसके लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। वो मानती है कि मैं ये सब रोक सकता हूं। मैंने गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर दी, और उसे समझाने की कोशिश करने लगा कि तुम सो जाओ। तुम परेशान मत हो। लेकिन वो तो सुबकने लगी। उसने कहा भैया एक १४ साल की लड़की की हत्या हुई है। अपने मां बाप की इकलौती बेटी की हत्या। तुम टीवी वाले उसमें भी मजे ढूंढ रहे हो। कोई चटखारे लेकर बता रहा है कि नौकर के साथ उसके अवैध संबंध थे, इसी लिए उसके मां बाप ने उसे मार दिया तो कोई बता रहा है कि घर में काम करने वाले हर नौकर के साथ वो सोती थी और नौकरों ने आपसी रंजिश में ही आरुषि को मार दिया। किसी ने उसके साथ बलात्कार की खबर चलाई तो किसी ने अवैध संबंधों का पुख्ता प्रमाण टीवी के सामने रख दिया।
मेरी बहन ने मुझसे सीधे-सीधे कहा कि जिस खबर पर तुम्हारी आंखें नम होनी चाहिए थी उस पर तुम भी मजे लूट रहे हो। सोचो, वो १४ साल की एक लड़की थी। किसी की बेटी थी। मां-बाप के कलेजे पर क्या बीत रही होगी? तुम जो दिखा रहे हो वो अगर तुम्हारी नजर में सच भी है तो कम से कम हर सच को इस तरह बयां करना क्या जरुरी है? ऐसी खबरों से तो लोगों का हर रिश्ते से भरोसा ही उठ जाएगा। तुम १४ साल की एक लड़की की मौत के बाद उसके बेडरूम का राज खोलने को बेताब हो.... तुम्हें किसने ये हक दिया कि तुम्ही जांच एजंसी बन जाओ? वो बोलती जा रही थी और मैं सन्न था। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसने आगे कहा कि वो १४ साल की लड़की किसी की बेटी हो सकती है, मेरी-तुम्हारी या फिर तुम्हारे उन दोस्तों की भी जो उसकी तस्वीर दिखा-दिखा कर मजे लूट रहे हैं। सोचो- खूब सोचो......किसी के साथ ऐसा हो जाए तो हमें क्या करना चाहिए?
मेरी आवाज बंद थी। बहुत मुश्किल से मैं उससे बस इतना कह पाया कि अभी मैं कार चला रहा हूं, घर पहुंच कर मैं तुम्हें फोन करता हूं। इतना कह कर मैंने फोन रख दिया।
मैं घर आ गया। दो दिन बीत चुके हैं और मैं अपनी बहन को अब तक फोन नहीं कर पा रहा हूं।
जानते हैं क्यों?
क्योंकि मैं शर्मिंदा हूं।
मैं सारी रात सो नहीं सका। नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली आरुषि तलवार की हत्या की खबर से मैं विचलित जरुर हुआ था लेकिन अब मैं शर्मिंदगी के एहसास से गुजर रहा था। क्या हम संवेदना शून्य होकर बस हर चीज में मजे ले रहे हैं? आरुषि जैसी घटना हमारे अपनों के घर में घट जाए तो हम क्या करेंगे? उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हम खबरों में वैसे ही पोस्टमार्टम करेंगे जैसा कर रहे हैं? हत्या के बाद उसके प्राइवेट पार्ट से निकलने वाले द्रव को भी रेप....सेक्स...और ऐसे बहुत सारे वीभत्स शब्दों से जोड़ने में हमने देर क्यों नहीं लगाई?
हमने ये जानने की कोशिश भी क्यों नहीं कि मौत से जूझते हुए आदमी के शरीर से ऐसे बहुत से द्रव सिर्फ भय से निकलने लगते हैं...एक ऐसे भय से...जो जिंदगी की सारी जंग को हारने के बाद शरीर को बचा लेने के क्रम में निकल पड़ते हैं।
मेरी मां की मौत कैंसर से हुई थी और जिस दिन उसकी मौत हुई थी...शरीर से आत्मा के निकलने का वो जंग मैंने देखा था। मैंने देखा था कि किस तरह एक पल के लिए ही सही...मौत से पहले उसका पूरा शरीर एकदम भिंच गया था। आंखें कैसे एकदम फैल गई थीं...और....और...
फिर हम ये क्यों नहीं सोच पा रहे कि एक १४ साल की लड़की मरने से पहले जिंदगी से किस कदर जूझी होगी? वो लड़की जिसने मरने से पहले घर वालों के साथ डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाना खाया होगा...वो लड़की जिसने अपने बिस्तर पर जाने से पहले पापा और मम्मी को गुडनाइट कहा होगा...वो लड़की जो अपने दोस्तों के एक एसएमएस पर खिलखिला पड़ती होगी...वो लड़की जो अभी जिंदगी का एक कतरा भी नहीं जी पाई थी...
.....उस लड़की के बेडरूम में और कौन सा राज हो सकता था... उसके बेडरूम में होंगे तो बस थोड़े से वो गुलाबी सपने होंगे जिसे अपनी आंखों में समेटे हुए वो बिस्तर पर लेटी होगी... उसके कमरे में थोड़े से उमड़ते - घुमड़ते बादल होंगे जिनके पार वो छोटी सी चिड़िया बन कर उड़ती होगी..

फिर तो मेरी बहन सुबकते हुए ठीक ही पूछ रही थी....कि १४ साल की बच्ची के बेडरूम का और कौन सा राज तुम खोलने जा रहे हो?

Monday 22 October 2007

3 MISSED CALLS - रात के आंसू

मेरी पत्नी ने बताया कि सुबह से तीन बार उसके ऑफिस में काम करने वाली लड़की ने फोन किया और हर बार उठाने से पहले काट दिया। मेरी पत्नी ने कहा कि ये मिस्ड कॉल छुट्टी की कॉल है। मैंने उससे पूछा कि मिस्ड कॉल देने का क्या मतलब है? वो घंटी बजा कर फोन बंद करने की जगह पूरी बात कर लेती। बात थी ही ऐसी कि उसके पास मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसने कहा कि अब ऑफिस जा कर ही पता चलेगा कि आखिर बार-बार मिस्ड कॉल देने का मतलब क्या था?

बात आई गई हो जाती। शायद मुझे याद भी नहीं रहता कि उस दिन सुबह में ऐसा कुछ हुआ है। लेकिन उसी रात मेरे ऑफिस में काम करने वाले एक साथी के फोन की घंटी बजी। आम तौर पर वो फोन पर संक्षिप्त बात करता था लेकिन उस रात उसने लंबी बात की तो मुझे थोड़ा अटपटा सा लगा। फोन पर बात कर वो वापस आया तो मुझे थोड़ा अनमना सा दिखा। कुछ देर तो वो चुपपाच काम करता रहा फिर उसने मुझसे अगले दिन की छुट्टी मांगी। वो आम तौर पर छुट्टी नहीं लेता था, और कभी लेता भी था बहुत पहले से इसकी जानकारी दे देता था। लेकिन रात में साढ़े 12 बजे फोन का आना और फिर आधी रात को ये बताना कि सर कल मैं नहीं आउंगा मुझे हैरत में डाल गया। वो जानता था कि टी वी न्यूज चैनल में अचानक छुट्टी नहीं लेनी चाहिए, बाकी साथियों के लिए समस्या आ जाती है। मैंने सोचा भी कि उससे पूछूं कि बात क्या है लेकिन चुप रह गया, क्योंकि उस रात मैंने उसकी आंखों में आंसू के चंद कतरे देखे थे। यही सोचा कि कोई जरुरी बात होगी वर्ना वो यूं ही छुट्टी ना लेता है और ना लेगा।

अगले दिन सुबह मेरी पत्नी ने बताया कि मिस्ड कॉल देने वाली लड़की ने छु्ट्टी नहीं ली, बल्कि पूरे समय वो ऑफिस रही। लेकिन उसके आगे उसने जो बताया वो बहुत ही हैरान कर देने वाला था। उसने बताया कि मिस्ड कॉल उसने इसलिए दिया था ताकि छुट्टी ना लेनी पड़े।
ये बात कुछ अजीब सी थी। कोई छुट्टी ना लेने के लिए मिस्ड कॉल क्यों देगा? ये मैंने नहीं पूछा, कोई भी यही पूछता। मेरी पत्नी ने बताया कि कल उसके पति का जन्मदिन था। और उसका पति उसे लगातार जोर दे रहा था कि वो छुट्टी ले ले। उस लड़की ने अपने पति से कहा कि ठीक है , मैडम से बात करके छुट्टी ले लेती हूं, और उसने तीन बार फोन किया और तीनों बार मिस्ड कॉल देकर अपना फोन बंद कर लिया। अपने पति से उसने कहा कि मैडम फोन नहीं उठा रही हैं, और बिना बताए अचानक छुट्टी लेना ठीक नहीं, इसलिए ऑफिस जाना ही होगा। पत्नी ने उससे कहा कि ऐसी बात थी तो फोन पर बात कर ही लेती और छुट्टी ले भी लेती। आखिर पति का जन्मदिन था उसके भी तो कुछ अरमान होंगे।

इस पर उस लड़की ने कहा, "मन तो था छुट्टी लेने का। लेकिन जब भी हम छुट्टी लेते हैं और घर मे साथ-साथ होते हैं तो हमारा झगड़ा हो जाता है। बात कुछ भी हो झगड़ा होकर ही रहेगा। मैं नहीं चाहती थी कि उसके जन्मदिन वाले दिन हमारा झगड़ा हो इसलिए उसके कहने पर मैंने छुट्टी के लिए फोन भी किया ताकि उसे भरोसा हो जाए कि मैं छुट्टी चाहती हूं, और मैंने छुट्टी ली भी नहीं।"
इस पूरे मामले पर हमने लंबी चर्चा की। और यहीं मैंने पत्नी को बताया कि मेरे ऑफिस में एक लड़के ने कल आधी रात को अचानक छुट्टी मांगी है। मुझे भी नहीं पता कि आखिर वो किसका फोन था जिसने उसे अंदर तक हिला दिया था। पत्नी ने सलाह दी कि मैं उस लड़के को फोन करके पता करूं कि आखिर माजरा क्या है?

मैंने उसे फोन किया। मेरे साथी ने फोन उठाया। मैंने बातचीत शुरु करते हुए पूछा कि घर में सब खैरियत तो है ना! मेरे इतना कहते ही वो सुबक पड़ा। उसने बताया कि सर, कल रात मेरी पत्नी ने फोन किया और बताया कि उसका चार साल का बेटा अचानक नींद उठ कर रोने लगा और उसने जिद पकड़ ली कि पापा को बुलाओ। मैंने बहुत दिनों से पापा को नहीं देखा है। और इतना कह मेरा साथी फूट-फूट कर रोने लगा।

उसने आगे बताया, "सर, मैं रोज घर से दो बजे निकलता हूं, और रात में घर लौटते हुए रोज एक बज जाता है और तब तक मेरा बेटा सो चुका होता है। सुबह सात बजे वो स्कूल जाता है और दोपहर ढाई बजे तक लौटता है। ऐसे में सिर्फ हफ्ते की एक छुट्टी ही होती है जब मैं उसको मिल सकता हूं, या मिल पाता हूं। लेकिन उस दिन बाकी के इतने काम होते हैं कि उन्हें पूरा करने में पूरी छुट्टी निकल जाती है। ये सच है कि मेरे बेटे ने कई हफ्तों से वाकई मुझे नहीं देखा। इसी बीच उसने टीवी पर कोई फिल्म देखी जिसमें पत्नी को छोड़ कर पति चला गया है- और बेटे के बाल मन में कहीं बैठ गया कि पापा भी सबको छोड़ कर घर से चले गए हैं।"


उसकी बातें सुन कर मैं सन्न रह गया।
मैं सोचने लगा कि हम कहां भाग रहे हैं? किससे भाग रहे हैं? मेरी पत्नी के ऑफिस में काम करने वाली लड़की अपने पति से प्यार नहीं करती ऐसा नहीं है, लेकिन वो उसके साथ अकेले के उन पलों को नहीं गुजारना चाहती जो उसे दंश देते हैं। वो उसके साथ पूरी जिंदगी गुजार सकती है लेकिन छु्ट्टी के 12 घंटे नहीं गुजार सकती। वो उन पलों को नहीं जीना चाहती जो उसे और अकेला कर देंगे। वो जानती है कि दफ्तर से घर आने के बाद खाना बनाना, बिस्तर ठीक करना और फिर टीवी देखते हुए साथ में सो जाना उतना बुरा नहीं होगा जितना की साथ में कई घंटे बिना किसी काम के गुजार देने में होगा।

वहां लड़ाई है अहं की, आजादी की और जिंदगी को भोगने की जद्दोजेहद से जुडे़ सवालों की।


मेरा साथी अपने घर परिवार के बारे में जिम्मेदार है और वो उनके बारे में दिन रात सोचता है। लेकिन वो अपने बेटे को समय नहीं दे पा रहा, प्यार नहीं दे पा रहा।
आखिर क्यों? दोनों भाग रहे हैं। दोनों के पास ना तो रुकने का वक्त है और ना जरुरत है। दोनों की मंजिलें दोनों को नहीं पता। सब भाग रहे हैं, इसलिए वे भी भाग रहे हैं। लेकिन क्या पाना है दोनों नहीं जानते।

क्या हम भी उनकी तरह ही कहीं भाग रहे हैं? भाग रहे हैं तो क्यों ?

मुझे भी नहीं पता। मेरी पत्नी भी क्या किसी छुट्टी वाले दिन यूं ही चाहती होगी कि काश वो ऑफिस चली जाती। क्या मेरे बेटे ने भी कभी ये चाहा होगा कि पापा की उंगली पकड़ कर शाम को पार्क में घूमने जाता। क्या मैंने भी पत्नी की आजादी छीनने की कोशिश की होगी। क्या वो भी मेरे साथ जिंदगी भले गुजार रही है लेकिन छुट्टी नहीं गुजारना चाहती।
बहुत सोचा। जितना सोचा उतना उलझता गया। और यहीं मुझे याद आ रहा है कि पिछले अट्ठारह सालों से मैंने कोई शाम नहीं देखी।

मेरी हर शाम दीवारों के बीच गुजरी हैपता ही नहीं चला कि इन 18 सालों में मेरी जिंदगी की 6 हजार 570 शामें कहां गुम हो गईं।


जब तक जवाब नहीं मिलेगा मिस्ड कॉल की घंटियां मेरे दिल और दिमाग को चीरती रहेंगी।

Friday 14 September 2007

3 MISSED CALLS - रात के आंसू

पिछले दिनों दो बातें ऐसी थीं जिसने मुझे काफी परेशान किया।
1. मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि उसके मोबाइल पर सुबह-सुबह तीन मिस्ड कॉल आए ।
2. मेरे दफ्तर में एक साथी ने मुझसे अगले दिन की छुट्टी मांगी, तो वो सचमुच कातर था।

दोनों घटनाओं ने मुझे काफी परेशान किया - दोनों पर आपसे चर्चा करुंगा- दो दिनों बाद।